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Lodha’s History

लोधा जाति का इतिहास

हमें विश्वास है कि यह लेख पढ़ने के बाद समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को गौरवान्वित महसूस करेगा कि उसने लोधा जाति में जन्म लिया है और अपने नाम के साथ गर्व से लोधा लिखेगा।

इस जाति के इतिहास के बारे में पहले भी हमारी जाति के कई विद्वानों ने लिखा है, इन्टरनेट पर भी काफी कुछ मिलता है, लेकिन अभी तक कई बातों को छिपाया गया है जिसकी जानकारी समाज को होना आवश्यक है। वास्तव में हमारी जाति सर्वप्रथम ‘लोध‘ और फिर लोधा के नाम से ही जानी जाति थी और आज भी भारत के अधिकांश प्रान्तों में लोधा के नाम से ही जानी जाती है। लोधा जाति के बारे में ऐसी ही छिपी हुई बातें में इस लेख के माध्यम से आप तक पहुंचाना चाहता हूॅं।

वैदिक व पौराणिक काल में जब समाज चार वर्गों में विभाजित था तब ये लोध गुण वाले क्षत्रियों का एक विशेष वर्ग माना जाता था, कालान्तर में जब समाज में जातियां बनी तो इन लोध गुण वाले क्षत्रियों को ‘लोध‘ जाति का माना जाने लगा। ‘लोध’ या ‘लोधा’ जाति का उल्लेख मुगलकाल की व ब्रिटिशकालीन कई ऐतिहासिक पुस्तकों में मिलता है।

संस्थापक: अखिल भारतीय लोधा महासभा

लोधा जाति के इतिहास के संकलनकर्ता जिनके संकलन के आधार पर श्री अजय कुमार लोधा द्वारा ‘‘लोधा जाति का इतिहास’’ नामक ई-पुस्तक को तैयार किया गया है।

ब्रिटिशकाल की कुछ पुस्तकों में जो कि भारत के मध्यप्रान्तों में रहने वाली जातियों से सम्बन्धित थी इनमें ‘लोधी’ शब्द से जाति को बताया गया है, लेकिन इन पुस्तकों में यह भी स्पष्ट लिखा हुआ है कि इस जाति के लोग पहले लोधा ही लिखते थे बाद में लोधा शब्द को भ्रष्ट (corrupt) करके ये लोधी लिखने लगे हैं।

मैंने इस लेख के माध्यम से लोधा जाति से सम्बन्धित जानकारियां जो कि ऐतिहासिक पुस्तकों में दर्ज है, आप लोगों के समक्ष लाने का प्रयास किया है और संदर्भित पुस्तक का पूरा विवरण पृष्ठ संख्या सहित दिया है, हालांकि लेख में बार-बार पृष्ठ संख्या लिखना मुझे थोड़ा अटपटा लगा शायद आपको भी लगे, लेकिन फिर भी मैंने लिखा क्योंकि मैं चाहता हॅूं कि लोधा जाति के इतिहास को जानने का इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति इन पुस्तकों का अध्ययन करे, पूरी पुस्तक न पढ़ पाये तो कम से कम उल्लेखित पृष्ठों को तो अवश्य पढ़े और फिर निष्पक्ष रूप से इस लेख पर अपनी टिप्पणी दे और यदि मुझसे कहीं कोई त्रुटि हो गई हो तो अवगत करायें जिससे कि में संशोधन कर सकूॅं। संसार की सर्वश्रेष्ठ एवं प्राचीन पुस्तक ऋग्वेद के मण्डल 3, अध्याय 3, सूक्त 53 एवं मंत्र 23 में लिखा है :

न सायकस्य चिकिते जनासो लोधं नायन्ति पशु मन्यमानाः।।
नावाजिनं वाजिना हासयन्ति न गर्दभं पुरो अश्वान्नयन्ति।।23।।


अर्थात वीर पुरूष बाणों के कष्ट को कुछ नहीं समझते हैं। वे लोभी शत्रु को पशु मान कर ले जाते हैं। वे बलवानों से निर्बलों का उपहास नहीं कराते। गधों की तुलना अश्वों से नहीं कराते। इस मंत्र में ‘लोधं’ शब्द वीर योद्धा के लिये प्रयुक्त किया गया है।

ऋषि मुनियों ने इस मंत्र का विश्लेशण करते हुए कहा है कि किसी राजा के वही वीर श्रेष्ठ होते हैं जिनमें वीरोचित लोध गुण होता है, जो युद्ध में पारंगत अपनी सेना के अंगों को भली भांति स्तर करना और उनसे युद्ध कराना जानते हैं। इस मंत्र में प्रयुक्त शब्द लोधं से ही हमारी लोधा जाति की उत्पत्ति हुई है।

कहा जाता है कि चन्द्र वंश की पांचवीं पीड़ी में चन्द्र पुत्र महाराज बुध का जन्म हुआ था। महाराज बुध के द्वारा सूर्यवंश की इला नामक सुन्दरी से विवाह करने के कारण सूर्यवंश एवं चन्द्रवंश में अनबन हो गई और युद्ध छिड़ गया। ये युद्ध हजारों वर्षों तक चलता रहा किन्तु किसी की भी अन्तिम विजय नहीं हुई। अन्त में महाराज बुध ने ऋषि मुनियों की सलाह से ऋगवेद के कथित मंत्र की मंत्रणानुसार चन्द्र वंश में से छांट-छांट कर लोध गुण युक्त वीरों की सेना तैयार कर युद्ध प्रारम्भ किया तो महाराज बुध को युद्ध में अन्तिम विजय प्राप्त हुई। हार मानकर सूर्यवंश ने चन्द्रवंश की आधीनता स्वीकार कर ली और चंद्रवंश की पताका सम्पूर्ण आर्यवर्त में फैहराने लगी।

महाराज बुध ने चन्द्रवंश में से छांट-छांट कर जो लोध गुण युक्त वीरों की सेना बनाई उस सेना की कालान्तर में अलग से पहचान बन गई और वे लोध गुण युक्त वीर धीरे-धीरे लोध क्षत्रीय कहलाने लगे और कालान्तर में लोध क्षत्रीय लोधा क्षत्रीय कहलाने लगे जो आज भी पूरे भारत में लोधा जाती के नाम से ही जाने जाते हैं। लोधा जाति की उत्पत्ति के कथन की सत्यता हिन्दी साहित्य के व्याकरण से भी प्रमाणित होती है। जिस प्रकार से गंगः के अपभ्रंश से गंगा शब्द बना ठीक उसी प्रकार से लोधः शब्द के अपभ्रंश से लोधा शब्द बनना भी स्वाभाविक है। इतना ही नहीं सहिंताओं के रचनाकाल में हमारा लोधा समाज लोध क्षत्रीय कहलाता था। गर्ग सहिंता, अत्रिसंहिता एवं नारद संहिता आदि में लोधा क्षत्रियों का उल्लेख हुआ है।

लोधा जाति की उत्पत्ति के कथन की सत्यता का ज्वलंत उदाहरण उत्तरप्रदेश के जनपद बारांबंकी के ग्राम धमेड़ी में बना लोधेश्वर मन्दिर है। लोधा जाति के लोगों द्वारा पूजित होने के कारण ही भगवान शंकर लोधेश्वर कहलाये। यह बात स्वयं लोधेश्वर शब्द से स्पष्ट होती है। लोधेश्वर शब्द का सन्धिविच्छेद लोध+ईश्वर होता है। लोधेश्वर भगवान के इस प्राचीन एवं ऐतिहासिक मंन्दिर में आज भी वर्ष में दो बार मेला भरता है और यह मेला लोधाओं का मेला कहलाता है। इस मेले में अधिकांशतः लोधा जाति के लोग ही आते हैं। दूरस्थ स्थानों से लोधा समाज के लोग कांवडों में गंगाजल लाकर लोधेश्वर भगवान पर चढ़ाते हैं। लोधा जाति के अधिकांशतः लोग लोधेश्वर भगवान को अपना ईष्ट देव भी मानते हैं।

लोधा जाति भारत के विभिन्न प्रान्तों में जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़, उड़ीसा आदि राज्यों में करोड़ों की संख्या में बसी हुई है और लोधा ही कहलाती है। लोधा जाति की सर्वाधिक जनसंख्या उत्तर प्रदेश में है परन्तु वर्तमान में उत्तर प्रदेश में समाज बन्धु लोधा की जगह लोधी, लोधी राजपुत, या राजपूत के नाम से जाने जाते हैं। जबकि वास्तव में पहले समूचे उत्तर प्रदेश में हमारा समाज लोधा के नाम से ही जाना जाता था। वैसे तो यह कहावत प्रसिद्ध है कि ‘‘प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या’’ अर्थात जो प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देता है उसे प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। परन्तु जिस प्रकार से उत्तर प्रदेश से लोधा शब्द पूर्ण रूपेण गायब हुआ है, प्रमाण दिये बगैर आपको यह विश्वास नहीं होगा।

समाज बन्धुओं अपनी बात को साबित करने के लिये में आपके समक्ष कुछ ब्रिटिशकालीन एतिहासिक पुस्तकें, प्रशासनिक रिकॉर्ड व लेख आदि प्रस्तुत कर रहा हूॅ जिससे आप इस बात पर विश्वास करने पर बाध्य हो जाएंगे कि पहले पूरे उत्तर प्रदेश ही नहीं सम्पूर्ण भारत में हमारी जाति सिर्फ और सिर्फ लोधा के नाम से ही जानी जाती थी।

उत्तर पश्चिमी प्रान्तों (वर्तमान उत्तरप्रदेश) में लोधा जाति

अपनी बात को साबित करने के लिये मैं सर्व प्रथम सन् 1862 में प्रकाशित चार्लस अर्ल्फड इलिआट् (Charles Alfred Elliott) द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘द क्रोनिकल ऑफ उन्नाव-ए डिस्ट्रिक इन अवध’’ (The Chronicles of Oonao: A Distric in oudh) के बारे में बताना चाहूंगा। इस पुस्तक से यह भी स्पष्ट होता है कि वर्तमान लोधा जाति सर्वप्रथम लोध के नाम से जानी जाति थी जैसा कि वेदों, पुराणों व अन्य प्राचीन धार्मिक ग्रंथो में बताया गया है जो कि इस लेख में ऊपर स्पष्ट किया गया है।

इस पुस्तक के पृष्ठ 25 पर लिखा है कि उन्नाव जिले के मध्यभाग में झुलोतर, पुरिउर, सुरोसी और असोहा परगने में निम्न श्रेणी की जातियों की जनसंख्या फैली हुई थी जैसे लोध, लूनियां, सोनार, गुडी, अहीर, कुरमी, थुथेरा आदि।

पृष्ठ 33 पर लिखा है कि लगभग 250 वर्ष पूर्व जुनवार लोगों की एक शाखा फतेहपुर चौरासी परगने में वहां के आदिवासी बाशिंदों थुथेरा और लोध लोगों से जमीने लेकर बस गये। पृष्ठ 36 पर लिखा है कि जिस जगह पर राजा उदेयभान ने कब्जा किया था वो लोध लोगों के द्वारा आबाद थी। पृष्ठ 47 पर लिखा है कि सैंगर राजपूतों की ग्यारवीं पीढ़ी ने पुरसुन्दन परगने के लोध जमींदारों को अपने अधीन कर लिया था। लेकिन लोध लोग अपनी पद प्रतिष्ठा में हुई कमी को भुला नहीं पाए और वे सैंगर राजपूतों के विरोध में खड़े हो गये और उन्हें मार दिया परन्तु औरतों व बच्चों को छोड़ दिया। पृष्ठ 54 पर लिखा है कि मुगुरवारा गांव में लोध लोगों ने चन्देलों पर रात में आक्रमण कर बड़ी संख्या में उन्हें मौत के घाट उतार दिया था।

पृष्ठ 68 पर चौहान राजा त्रिलोकचन्द की शक्ति का बखान करते हुए लेखक ने एक वाकया लिखा है, जिसके अनुसार एक बार राजा त्रिलोकचन्द शिकार पर गया था जहां उसे बहुत तेज प्यास लगी, उसे एक तालाब के किनारे आम के पेड़ के नीचे एक व्यक्ति लोटे से पानी पीता दिखा, तो वह सीधे वहां गया और उस व्यक्ति के हॉंथ से लोटा छीन कर पानी पी लिया। पानी पीने के बाद राजा ने उस आदमी से पूंछा ‘तुम कौन हो’ उस व्यक्ति ने कहा ‘महाराज में लोध हूॅ’। तब राजा ने कहा कि ‘तमु अमतरा पाठक ब्रहाम्मण हो, तुम ताल और आम के पेड़ की सेवा करते हो’। कहा जाता है कि तभी से लोध लोगों को धार्मिक कार्य आदि करने का अधिकार मिला। पृष्ठ 97 पर लिखा है कि परगना मोहन के धोरा मुन्वरिया में लोध जमींदार नीम के पेड़ के नीचे बैठ कर निषपक्ष न्याय करता था।

इसी प्रकार सन् 1872 में प्रकाशित मैथ्यू एटमोर शैरिंग (Matthew Atmore Sherring) द्वारा लिखित पुस्तक ‘। ‘हिन्दू ट्राईब्स एण्ड कास्ट एज रिप्रजेन्टेड इन बनारस’’ (Hindu Tribes and Casts as Represented in Benaras-1872)। के पृष्ठ संख्या 195,196 पर इलिऑट महोदय द्वारा लिखित पुस्तक द क्रोनिकल ऑफ उन्नाव का उदाहरण देते हुए अवध के राजा त्रिलोक चन्द द्वारा एक लोध के हांथ से लोटा छीन कर पानी पीने वाली घटना एवं उसके बाद राजा द्वारा यह कहना कि तुम लोध नहीं एक ब्राहम्मण हो वाली घटना को बताया गया है।

पृष्ठ 348 पर लोधा जाति को एक खेतिहर मजदूर जाति कहा गया है। इसी पुस्तक के पृष्ठ 349 पर शैरिंग महोदय लिखिते हैं कि :-
‘‘मेरे निर्णय के अनुसार लोध जाति मूसाहार जाति के भांति ही एक स्वतंत्र जाति है। यह प्राचीन काल से है और कुछ समय पहले के इतिहास में भी इसका उल्लेख है। माना जाता है कि लोध जाति के लोग मूलतः लोध नामक पेड़ की छाल को बेचा करते थे जो कि रंगाई और दवाई के लिये काम में आती थी। यद्यपि वर्तमान में लोध जाति कृषकों की श्रेणी में आती है। ऐसा लगता है कि ये मुरादाबाद जिले में अति प्राचीन काल से रह रहे हैं। मि. सी.ए. ऐलिओट ने अपनी पुस्तक ‘क्रोनीकल ऑफ उन्नाव इन अवध’ में कहा है कि ‘लोध जाति निम्न स्तर की जाति है और इस जिले में प्राचीन काल से रह रही है।’ (इस पुस्तक का विवरण लेख में ऊपर दिया जा चुका है।) ये आगरा जिले में सैकड़ों वर्षां से हैं और माना जाता है कि ये मथुरा व भरतपुर से आये हैं। लगभग 60,000 लोध व्यक्ति अकेले ऐटा में रहते हैं। ये केवल खेतिहर मजदुर ही नहीं बल्कि भूस्वामी भी हैं ऐसे कई उदाहरण हैं।
इनकी छः उप जातियां हैं।
1. पतरिया
2. मथुरिया
3. संकलाजरिया
4. लखिया
5. खारिया
6. पनिस
लोध इस जिले के पुराने निवासी हैं। ऐटा जिले में लोध की पतरिया उप जाति अधिक संख्या में है। लोध लल्लतपुर (वर्तमान ललितपुर) और झांसी जिले में भी मिलते हैं और वहां वे काफी लम्बे समय से हैं।’’ शैरिंग महोदय ने इसी नाम से दो पुस्तकें वोल्यूम 2,3 सन् 1879 व 1881 में और लिखीं है जो मध्यप्रदेश व राजपुताने की जातियों से सम्बन्धित हैं। इसका विवरण में आगे करने वाला हूॅ।

इसके अतिरिक्त सन् 1872 में हुई जनगणना से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि उत्तर प्रदेश में पहले हमारी जाति सिर्फ लोध या लोधा के नाम से ही जानी जाती थी। ‘‘सेन्सस ऑफ इण्डिया-नोर्थ वेस्टर्न प्रोविन्सेस, जिल्द 1-1872’’ (Census of India:North-Western Provinces-Vol.-I,1872) भारत की जनगणना 1872 की रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या रोमन अंकों में Lxxxvi अर्थात 86 पर स्पष्ट लिखा है व इसी पृष्ठ पर दी गई तालिका में भी दर्शाया गया है कि उत्तर पश्चिमी प्रान्तों यानि कि वर्तमान उत्तर प्रदेश में लोधा जाति की जनसंख्या 6,42,334 है। इसी प्रकार ‘‘अवध गजेटियर वोल्यूम 2’’, (Oudh Gazetteer Vol.II) जो कि सन् 1877 में प्रकाशित हुआ था के पृष्ठ 72 से 75 के अनुसार उत्तर प्रदेश के जनपद उन्नाव की तहसील हसनगंज के इन्दरपुर नामक ग्राम के जस्सा सिंह लोध और शेखपुर के भेरे अहीर के मध्य सरहद पर युद्ध हुआ। जिसमें जस्सा िंसंह लोध की जीत हुई और उसने शेखपुर को अपने अधिकार में कर लिया। जस्सा सिंह ने आसपास के जंगलों को कटवा कर यहां हड्हा नामक ग्राम बसाया था। पृष्ठ 100 पर लिखा है कि परगना झलोतर अजगैन तहसील हसनगंज जिला उन्नाव में पहले लोधा एवं भर्हर रहते थे। बाद में यहां ठाकुर और ब्राहम्मणों का बाहुल्य हो गया। पृष्ठ 111 पर लिखा है कि लगभग 9 सौ वर्ष हुए कांथ नामक लोधा ने कांथा नामक नगर बसाया था। जो कि उन्नाव जिले के पुरवा परगने में तहसील से 9 मील व सदर स्टेशन से 18 मील की दूरी पर है। गांव में पहुंचने के दो रास्ते है, पहला पुरवा से लखनउ जाने वाला दूसरा नवाबगंज से पुरवा की ओर जाने वाला जो गांव से होकर गुजरता है। गांव से एक मील दूर पूर्व में एक झील है जिसे पुरेन कहते हैं। लगभग 900 वर्ष पहले कांथा नामक लोधा व्यक्ति ने यहां के जंगल को साफ कर इस गांव को बसाया था इसीलिये इसे कांथा कहा गया है। पृष्ठ 121 के अनुसार सीतापुर तहसील के खैराबाद परगने में 6788 लोध लोग रहते हैं। पृष्ठ 205 पर दी गई तालिका के अनुसार खेरी जिले में 23281 लोधा कृषक व मजदूर रहते हैं। पृष्ठ 426 पर लिखा है कि लगभग एक हजार वर्ष हुए मांखी नामक लोधा ने मांखी नगर बसाया जो तहसील हसनगंज जिला उन्नाव में है। आगे इसी गजेटियर के जिल्द 3 पृष्ठ 577 पर लिखा है कि एक दिखित नामंक ठाकुर ने दिखिताना नांमक नगर बसाया और इसे जिला बनाया इस जिले में 14 परगने बनाये। उस समय यहां के लोधा तितर-बितर रहते थे और संगठित नहीं थे इसलिये कोई मुकाबला नहीं किया।

ब्रिटिश काल से पहले मुगल काल में भी लोधा जाति लोध के नाम से ही जानी जाती थी। अब्दुल फजल कृत ‘आयने अकबरी’ जिल्द 2, में पढ़ा जा सकता है। ‘‘आयने अकबरी वाल्यू 2’’ (AIN I AKBARI Vol. II) का अंग्रेजी में अनुवाद कर्नल एच.एस. जारेट् (Colonel H.S. Jarrett) ने किया था जो 1891 में प्रकाशित हुआ जिसके पृष्ठ 182 पर लिखा है कि सरकार जिला आगरा की शाही फौज में 300 सवार लोध राजपूत जाति के हैं। इसके अतिरिक्त सरकार कोण्डा व सरकार अहमदाबाद में लोध सैनिकों का होना बताया गया है।

‘‘ब्रीफ व्यू ऑफ द कास्ट सिस्टम ऑफ द नोर्थ वेस्ट प्रोविन्सेस एण्ड अवध-1885’’ (Brif View of Cast System of the North-Western Provinces and Oudh-1885) नामक पुस्तक जे.सी. नेसफील्ड (J.C. Nesfield) महोदय ने लिखी थी जो 1885 में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में वर्तमान उत्तर प्रदेश में रहने वाली सभी जातियों के बारे में बताया गया जिसमें लोधा जाति का भी वर्णन कई जगह किया है। पुस्तक के पृष्ठ 14 पर लिखा है कि लोधा जाति इस क्षेत्र की प्रमुख कृषक जाति है। लोधा शब्द अंग्रेजी के क्लोड-ब्रीकर (Clod Breaker) शब्द से बना है। यहां क्लोड ऑफ अर्थ से ‘लोड’ (Lod) और बरीकर से ‘हा‘ (ha) अर्थात लोधा (Lodha) है। पुस्तक में लिखा है कि लोधा जाति का यहां अच्छा दर्जा है। तथ्यों के आधार पर यह भी कहा जाता है कि अवध में रहने वाले कुछ लोध या लोधा परिवार पेड़ों की कटाई का कार्य करते थे। पृष्ठ 24 पर लोध या लोधा जाति को नमक बनाने वाली नूनियां जाति के समकक्ष बताते हुए लिखा है कि यह कृषक वर्ग में निचले स्तर की जाति है।

इसी प्रकार पुस्तक ‘‘स्टेटिकल डिस्क्रिप्टिव एण्ड हिस्टोरिकल एकाउन्ट ऑफ नोर्थ वेर्स्टन प्रोविन्सेस ऑफ इण्डिया’’ (Statical Descriptive and historical Account of The North Western Provinces of India) यह पुस्तक 14 जिल्दों (वोल्यूम्स) में सन् 1872 से 1896 तक श्रेणीबद्ध तरीके से प्रकाशित की गई हैं। प्रारम्भ की जिल्दों को एटकिन्सन महोदय ने और बाद की जिल्दों को एफ.एच. फिशर व जे.पी. हेवेट् ने लिखा है। इस पुस्तक की 14 जिल्दों में सम्पूर्ण उत्तर पश्चिमी प्रान्तों यानि कि वर्तमान उत्तर प्रदेश के सभी जिलों के बारे में विस्तार से बताया गया है। इन सभी पुस्तकों में अन्य जातियों के साथ लोधा जाति का भी विस्तृत विवरण है इन पुस्तकों का श्रेणीबद्ध विवरण लेख में निम्नप्रकार से दिया गया है।

इस पुस्तक का जिल्द (वोल्यूम) 1, सन् 1872 में प्रकाशित, एटकिन्सन महोदय द्वारा लिखित बुन्देलखण्ड के बांदा, हमीरपुर, जालोन, झांसी और ललितपुर जिलों के बारे में है। इस पुस्तक के पृष्ठ संख्या 267 पर झांसी जिले में रहने वाली हिन्दू जातियां उनकी जनसंख्या के साथ एक सारणी द्वारा दर्शाई गई हैं। जिसमें लोधा जाति की जनसंख्या 1872 की जनगणना के अनुसार 23570 बताई गई है। पृष्ठ संख्या 331 पर भी सारणी दी गई है जिसके अनुसार ललितपुर जिले में लोधा जाति की जनसंख्या 21747 बताई गई है। इसी पृष्ठ पर लिखा है कि लोधा लोगों के गांव पूरे जिले में फैले हुए है, लेकिन अधिकतर ये तालबेहत, बंसी और मरौरा परगनो में हैं। लोधा लोग अच्छे फसल उगाने वाले, शांत और मेहनती हैं। पृष्ठ 345 पर लिखा है कि दीवान उमराव लोधा को मिस्टर थोरन्टन ने अपने प्रभाव से दो गांव सइयदपुर और जालंधर हमेशा के लिये दे दिये थे जो पहले राजजू के कब्जे में थे, ये गांव आज भी दीवान उमराव सिंह लोधा के पास हैं। पृष्ठ 347 पर लिखा है कि ललितपुर के 639 गांवों से सरकार को रेवेन्यू दिया जाता था जिनमें 71 गांव लोधा जाति के हैं।

इसके अतिरिक्त इस पुस्तक के पृष्ठ संख्या 370, 374, 376, 382, 384, 404, 408, 422, 429, 434, 517, 535, 538, 575, 577, 589, 593, 595 पर जहां भी किसी जिले या परगने की आबादी के बारे में बताया गया है वहां अन्य जातियों के साथ लोधा जाति का उल्लेख अवश्य हुआ है।

सन् 1875 में प्रकाशित पुस्तक जिल्द (वोल्यूम) 2 में मेरठ डिवीजन के सहारनपुर और अलीगढ़ जिलों के बारे में बताया गया है। इस पुस्तक के पृष्ठ 45 पर लिखा है कि 1872 की जनगणना के अनुसार मेरठ डिवीजन के 5 जिलों में लोधा जाति की जनसंख्या 1,01,483 है। पृष्ठ 182 पर एक तालिका दी गई है जिसके अनुसार सहारनपुर में 3169 लोधा रहते हैं। पृष्ठ 187 पर लिखा है कि सहारनपुर जिले में जब नहरों का काम शुरू हुआ तब गुड़गांव व पंजाब से बहुत से लोधा यहां मजदूरी करने आए और यहीं बस गये। पृष्ठ 296 पर लिखा है कि ज्वालापुर परगना में 1969 लोधा रहते हैं। पृष्ठ 326 और 343 के अनुसार रूडकी और सुल्तानपुर परगना में भी लोधा रहते हैं।

पृष्ठ 396 पर एक सारिणी दी गई है जिसके अनुसार अलीगढ जिले में 38526 लोधा हैं। पृष्ठ 397 पर लिखा है कि अलीगढ जिले के कोईल, अतरौली अकबराबाद में 25 गावों पर लोधा लोगों का कब्जा है। जो पिछली शताब्दी से यहां हैं। 398 पर लिखा है कि लोधा अच्छे कृषक हैं। पृष्ठ 531 पर लिखा है कि अतरौली में 12538 लोधा हैं। 563 पर लिखा है कि हाथरस में लोधा हैं। पृष्ठ 579 व 581 पर लिखा है कि कोईल परगना में 9615 लोधा हैं। 587 पर लिखा है कि मोरथल में 2860 लोधा हैं। 603 पर लिखा है कि सिकन्दराराव परगना में 5007 लोधा और कायस्थ रहते हैं।

सन् 1876 में प्रकाशित पुस्तक जिल्द (वोल्यूम) 3 में मेरठ डिवीजन के शेष 3 जिलों बुलन्दशहर, मेरठ और मुजफ्फरनगर का वर्णन हैं। पुस्तक के पृष्ठ 48 पर तालिका दी हुई है जिसके अनुसार 1872 की जनगणना में बुलन्दशहर जिले में लोधा लोगों की जनसंख्या 51513 बताई गई है। पृष्ठ 51 पर लिखा है कि लोधा लोगों को मुकादम कहा जाता है। पृष्ठ 73 पर लिखा है कि लोधा अच्छे कृषि उत्पादक हैं। पृष्ठ 104 पर लिखा है कि अगोता परगना में 1198 लोधा हैं। पृष्ठ 108 पर लिखा है कि परगना अहार में 10317 लोधा रहते हैं। 116 पर लिखा है कि अनुपशहर में 3833 लोधा हैं। पृष्ठ 121 पर लिखा है कि बारां परगना में 8310 लोधा हैं। पृष्ठ 134, 139, 140, 153, 165, पर लिखा है कि परगना दादरी, डानकपुर, जेवार, खुरजा में लोधा हैं। पृष्ठ 172 पर लिखा है कि परगना पहास में 1258 लोधा हैं। पृष्ठ 177 पर लिखा है कि परगना सयाना में 6453 लोधा हैं। पृष्ठ 178, 191, 207 पर लिखा है कि शिकारपुर और सिकन्दाबाद में लोधा हैं।

पृष्ठ 260 पर दी गई तालिका के अनुसार मेरठ जिले में 7157 लोधा रहते हैं। पृष्ठ 352, 377, 386, 392, 396 के अनुसार बागपत, हापुर, गढमुक्तेशर, जलालाबाद, किथोर परगना में लोधा हैं। पृष्ठ 417 पर लिखा है कि परगना मेरठ में 3940 लोधा रहते हैं। पृष्ठ 425 पर लिखा है कि परगना पुथ में 1285 लोधा रहते हैं। पृष्ठ 504 पर दी गई तालिका के अनुसार मुजफ्फर नगर जिले में 1118 लोधा रहते है।

पुस्तक की जिल्द (वोल्यूम) 4, जो सन् 1876 में प्रकाशित हुई जिसमें आगरा डिवीजन के एटा, इटावा व मैनपुरी जिलों का वर्णन है। इस पुस्तक के इन्ट्रोडक्शन कॉन्टेन्ट के चौथे पृष्ठ पर जनसंख्या वाले पैराग्राफ में लिखा है कि इस क्षेत्र में अन्य हिन्दू जातियों में 2,20,883 जनसंख्या लोधा लोगों की है। इसी पैराग्राफ पर लिखा है कि अहीर, लोधा व जाट यहां स्वयं की भूमि के मालिक हैं।

पृष्ठ 44 पर एक सूची है जिसके अनुसार 1872 की जनगणना के आधार पर एटा जिले में लोधा लोगों की जनसंख्या 73873 बताई गई है। पृष्ठ 46 व 47 पर लिखा है कि एटा जिले में कई लोधा परिवार हैं जो 23 गांवों में भूमि का मालिकाना हक रखते हैं। जिनमें से 13 गांवा एटा परगने के हैं। इस जिले में लोधा लोगों के 7 गोत्र हैंः 1. करहर, 2. लाखेया, 3. बनयान, 4. संकलाजरिया, 5. पतुरिया, 6. मथुरिया और 7. खागी। इन गोत्रों में से पतुरिया गोत्र के लोधा पुरे एटा जिले में फैले हुए हैं परन्तु ज्यादातर एटा और मराहरा परगने में हैं। लोधा लोग कई छोटे गांवों के पट्टेदार हैं जो पहले एटा के राजा के मेनेजर के रूप में कार्य करते थे इसी वजह से यहां इन्हें ‘मुकादम‘ कहा जाता है। पृष्ठ 78 पर एक तालिका दी गई है जिसमें एटा जिले में रहने वाली जातियां और उनका भूमि पर मालिकाना हक दर्शाया गया है। इसमें लोधा जाति के 225 सदस्य बताये गये हैं जो ज्यादातर एटा और मराहरा में हैं और 7085 एकड़ भूमि के मालिक है। पृष्ठ 80 पर लोधा जाति को कृषक बताया है इसी पृष्ठ पर तालिका दी गई है जिसमें लोधा जाति के 14494 सदस्य कृषक बताए हैं जो सम्पुर्ण एटा जिले के कृषकों के 13 प्रतिशत हैं। पृष्ठ 116 पर लिखा है कि ऑलाई परगने में 363 लोधा परिवार हैं। 123 पर लिखा है आजमगढ़ परगने में 9395 लोधा हैं। 123, 128 पर लिखा है कि बारां में 1021 लोधा हैं। 133 पर लिखा है कि बिलराम परगने में 14735 लोधा हैं। 145 पर लिखा है कि सकीट परगने में 22753 लोधा हैं। 149 पर लिखा है कि फैजपुर बदानियां में 895 लोधा हैं। 161 पर लिखा है कि मराहरा में 14926 लोधा हैं। 168 पर लिखा है कि निधिपुर परगने में 853 लोधा हैं। 173 पर लिखा है कि पचलाना में 574 लोधा हैं। 186 पर लिखा है कि सहावर करसाना में 8410 लोधा हैं। 208 पर लिखा है कि सोनहार में 1272 लोधा हैं। 216 पर लिखा है कि सारों में 4249 लोधा हैं।

पुस्तक के पृष्ठ 281 पर एक तालिका दी गई है जिसके अनुसार इटावा जिले में 31795 लोधा जाति की जनसंख्या है। पृष्ठ 335 व 344 पर लिखा है कि लोधा लोग 30920 एकड़ भूमि पर खेती करते हैं जो कुल भूमि का 5.37 प्रतिशत है। 415 पर लिखा है कि औरया परगने में 5240 लोधा रहते हैं। 425 पर लिखा है कि भरथना में 2546 लोधा हैं। 430 पर लिखा है कि बिधुना में 8137 लोधा हैं। 450 पर लिखा है कि इटावा परगने में 10735 लोधा हैं। पृष्ठ 466 व 468 पर लिखा है कि लोधा भूस्वामी हैं और फफूंद परगने में 8137 लोधा हैं।

पुस्तक के पृष्ठ 557 पर एक तालिका दी गई है जिसके अनुसार मैनपुरी में लोधा लोगों की जनसंख्या 53658 हैं। पृष्ठ 559 पर लिखा है कि मैनपुरी जिले में लोधा जाति प्रत्येक 11 परगनों में रहती है जो मैनपुरी की कुल जनसंख्या का 7 प्रतिशत है। मुस्तफाबाद व भोगांव में ये बहुत सारी भूमि के मालिक हैं। इसके अतिरिक्त ये शिकोहाबाद, किशनी, बरनहाल, मैनपुरी परगने में भी भूमि के मालिक हैं। पृष्ठ 647 पर लिखा है कि अलीपुर पट्टी परगने में 391 लोधा लोग रहते हैं और 1103 लोधा भूस्वमी हैं जो 4414 एकड़ भूमि रखते हैं जो कि पूरी उपजाऊ भूमि का 32.64 प्रतिशत है। पृष्ठ 649, 650, 655, 664, पर लिखा है कि बझेरा बुजुर्ग, बल्टीगढ़, बरनहल, बेबर में लोधा रहते हैं। 675, 676 पर लिखा है कि भोगांव में 11541 लोधा रहते हैं। 2770 लोधा 12598 एकड़ भूमि के स्वामी हैं। पृष्ठ 677, 683, 685, 686, 696, 707, 708 के अनुसार छाछा, घिरोर, जसराना, करहल, किशनी नबीगंज में लोधा रहते हैं। 716, 718 पर लिखा है कि कुरावली परगने में 3023 लोधा रहते हैं। 720 पर लिखा है कि मैनपुरी टाउन में 1094 लोधा रहते हैं। 730, 731 पर लिखा है कि मैनपुरी परगने में 4716 लोधा रहते हैं जो 4312 एकड़ भूमि जोतते हैं। 743, 744 पर लिखा है कि मुस्तफाबाद परगने में 19934 लोधा रहते हैं दी गई तालिका के अनुसार 5.83 प्रतिशत भूमि के मालिक हैं। पृष्ठ 769, 770 पर लिखा है कि शिकोहाबाद परगने में 7254 लोधा है जो 1.86 प्रतिशत भूमि के स्वामी हैं।

पुस्तक की जिल्द (वोल्यूम) 5 सन् 1879 में प्रकाशित हुई जो कि रोहिलखण्ड डिवीजन के बदायूं, बिजनौर और बरेली जिलों के बारे में बताती है। पुस्तक के पृष्ठ 46 पर एक तालिका दी गई है जिसके अनुसार 1872 की जनगणना में बदायूं जिले में लोधा जाति की संख्या 5119 बताई गई है। पृष्ठ 142, 149, 170, 181, 190, 197, 207, 211, 219 व 228 के अनुसार बदायूं जिले के असदपुर, बिसौली, बदायूं इस्लामनगर, कोट, राजपुरा, परगनों में लोधा रहते हैं। सहवान परगने में 1825 लोधा जाति की संख्या है। सलीमपुर, सतासी और उझानी में भी लोधा हैं।

पृष्ठ 289 पर दी गई तालिका के अनुसार बिजनौर जिले में 294 लोधा रहते हैं। 378, 480 के अनुसार फजलपुर व नजीबाबाद परगने में भी लोधा रहते हैं। पृष्ठ 582 पर दी गई तालिका के अनुसार बरेली जिले में 42374 लोधा रहते हैं। पृष्ठ 623 पर लिखा है कि लोधा लोग यहां पर कृषी की रीड़ की हड्डी हैं। पृष्ठ 739, 758, 768, 782, 788, 795, 807 के अनुसार बरेली जिले के बीसलपुर परगने में 5980 लोधा, जहानाबाद में 6633 लोधा, पीलीभीत में 20835 लोधा लोग रहते हैं। इसके अलावा फरीदपुर, करोर, मीरगंज व नवाबगंज में भी लोधा रहते हैं।

पुस्तक की जिल्द (वोल्यूम) 6 सन् 1881 में प्रकाशित हुई जो कि कानपुर, गोरखपुर और बस्ती जिलों का वर्णन करती है। पुस्तक के पृष्ठ 31 पर लिखा है कि कानपुर धनी आबादी वाला उपजाऊ जिला है। जिसमें काछी, कुरमी और लोधा जाति के मेहनती किसान अधिक संख्या में हैं। पृष्ठ 49, 50 पर लिखा है कि कछवाह राजा मानसिंह बुन्देलखण्ड से अन्य जातियों के साथ लोधा जाति को भी कानपुर के बिलास परगने में लाये थे जो आज भी यहां भूस्वामी हैं। धातमपुर परगने में भी लोधा हैं। पृष्ठ 65, 67 पर एक तालिका दी गई है जिसके अनुसार कानपुर जिले में लोधा जाति की जनसंख्या 40783 हैं। अधिकतर लोधा लोग रसूलाबाद और जाजमउ परगने में रहते हैं और ये अच्छे कृषक हैं। पृष्ठ 124, 257, 267 के अनुसार शिवराजपुर में 7549 लोधा रहते हैं।

पृष्ठ 357 पर एक तालिका दी गई है जिसके अनुसार गोरखपुर में 2121 लोधा रहते हैं। पृष्ठ 623 पर एक तालिका दी गई है जिसके अनुसार बस्ती जिले में लोध या लोधा जाति की जनसंख्या 19080 बताई गई है।

पुस्तक की जिल्द (वोल्यूम)7 सन् 1884 में प्रकाशित हुई जो कि वर्तमान उत्तर प्रदेश के फरूखाबाद एवं आगरा जिले से सम्बन्धित है। इस पुस्तक के पृष्ठ 73 पर एक तालिका दी गई है जिसके अनुसार फरूखाबाद जिले में 22625 लोधा हैं। पृष्ठ 339, 355, 394 के अनुसार सौरिख, सकतपुर व तिरबा में लोधा रहते हैं। पृष्ठ 484 पर लिखा है कि आगरा जिले में 25000 से ज्यादा लोधा रहते हैं। पृष्ठ 537, 541, 545, 670 के अनुसार लोधा जाति के लोग यहां भूस्वामी थे और लगभग 23486 एकड़ भूमि पर खेती करते हैं जो कि सम्पूर्ण भूमि का 2.8 प्रतिशत है।

पुस्तक की जिल्द (वोल्यूम) 8 सन् 1884 में प्रकाशित हुई, जो कि जे.पी. हेवट्ट द्वारा लिखी गई है। इस पुस्तक में फतेहपुर जिले के बारे में बताया गया है। पुस्तक के पृष्ठ 39 पर एक तालिका दी गई है जिसके अनुसार फतेहपुर जिले में लोध या लोधा जाति की 46609 जनसंख्या है। पृष्ठ 41 पर लिखा है कि धाता और इकडाल परगने में लोधा जमींदार और भूस्वामी हैं। पृष्ठ 104, 105 व 114 से 120 तक में भी लोधा जाति के बारे में बताया गया है।

इस लेख में मैंने ‘‘स्टेटिकल डिस्क्रिप्टिव एण्ड हिस्टोरिकल एकाउन्ट ऑफ नोर्थ वेर्स्टन प्रोविन्सेस ऑफ इण्डिया’’ के उक्त 8 जिल्दों (वोल्यूम्स) का ही विवरण किया है, जिसमें वर्तमान उत्तर प्रदेश के लगभग सभी प्रमुख जिलों का वर्णन आ गया है। इन आठों जिल्दों (वोल्यूम्स) के अध्ययन से यह भी स्पष्ट हो गया है कि इन पुस्तकों को लिखते समय उत्तर प्रदेश में लोधी के नाम से कोई जाति नहीं थी।

सन् 1881 में की गई भारत की जनगणना में भी वर्तमान उत्तरप्रदेश में लोधा जाति के लिये लोध शब्द ही प्रयुक्त किया गया था। जिसका विवरण ‘‘सेन्सस ऑफ इण्डिया : नोर्थ वेस्टर्न प्रोविन्सेस एण्ड अवध -1881’’ (census of India:North-western Provinces and Outh-1881) पुस्तक में देखा जा सकता है। भारत की जनगणना 1881 की जनरल रिपोर्ट इस पुस्तक में दी गई है। पुस्तक के पृष्ठ 136 पर एक तालिका दी गई है जिसके अनुसार उत्तर पश्चिमी प्रान्तों एवं अवध यानि कि वर्तमान उत्तर प्रदेश में लोध जाति की जनसंख्या 10,00,599 (दस लाख पॉच सौ निनानवे) बताई गई है। पृष्ठ 137 पर भी एक तालिका दी गई है जिसमें सन् 1872 व 1881 की जनगणना में जातियों की जनसंख्या का तुलनात्मक विवरण दिया गया है। यह भी स्पष्ट किया गया है कि कौनसी जाति इस अवधि में कितनी बढ़ी या घटी है। इस तालिका के अनुसार उत्तर पश्चिमी प्रान्तों में लोधा जाति की जनसंख्या जो कि सन् 1872 की जनगणना में 6,42,334 थी वह सन् 1881 की इस रिपोर्ट में 6,54,363 हो गई है। इस प्रकार इस अवधि में लोध जाति की जनसंख्या में 12029 की वृद्धी दर्शाई गई है। पृष्ठ 138 पर जो तालिका दी गई है उसमें दर्शाया गया है कि उत्तर पश्चिमी प्रान्तों की कुल 38 प्रमुख जातियों में कौनसी जाति किस जिले में सबसे ज्यदा है। तालिका के अनुसार लोध जाति की सर्वाधिक जनसंख्या उन्नाव जिले में 81,223 बताई गई है। अर्थात उत्तर पश्चिमी प्रान्तों के उन्नाव जिले में लोधा जाति की जनसंख्या अन्य सभी जिलों से ज्यादा थी। सन् 1881 में प्रकाशित इस पुस्तक में जनगणना की दी गई जानकारी व तालिकाएं सन् 1872 में की गई जनगणना की भी पुष्टी करती है। जो कि इस लेख में पहले ही बताई गई है।

सन् 1891 में हुई जनगणना की जानकारी ‘‘जनरल रिपोर्ट ऑफ द सेन्सस ऑफ इन्डिया-1891’’ (General Report of the census of India-1891) से ली जा सकती है। इस रिपोर्ट के पृष्ठ 191,192 के अनुसार लोधा जाति कृषक वर्ग में कुरमी व माली के बाद तीसरे नम्बर पर बताई गई है। 1891 की जनगणना के अनुसार लोधा जाति की जनसंख्या 16,74,098 (सोलह लाख चौहत्तर हजार अठानवे) बताई गई है।

सन् 1901 व 1911 में हुई जनगणना की जानकारी ‘‘रिपोर्ट ऑफ द सेन्सस ऑफ इण्डिया -1911’’ (Report of the census of India-1911) से ली जा सकती है। इस रिपोर्ट के पृष्ठ 396 पर एक तालिका दी गई है। इस तालिका में सन् 1891,1901 व 1911 में की गई जनगणना के आधार पर भारत में रहने वाली विभिन्न जातियों की जनसंख्या बताई गई है। तालिका में लोधा जाति की जनसंख्या सन् 1891 में 16,74,098 बताई गई है। जो कि ‘‘जनरल रिपोर्ट ऑफ द सेन्सस ऑफ इन्डिया-1891’’ (General Report of the census of India-1891) में भी बताई गई है। तालिका के अनुसार सन् 1901 में की गई जनगणना में लोधा समाज की जनसंख्या 16,63,354 थी जो कि 1891 की जनसंख्या से कम है। तालिका में 1911 में की गई जनगणना के अनुसार लोधा जाति की जनसंख्या 17,32,230 बताई गई है। साथ ही तालिका में यह भी दर्शाया गया है कि 1891-1901 की अवधि में लोधा जाति की जनसंख्या में वृद्धि के स्थान पर 0.6 प्रतिशत की कमी हुई है और 1901-1911 की अवधि में 4.1 प्रतिशत की दर से वृद्धी हुई है।

सन् 1921 में हुई भारत की जनगणना के अनुसार संयुक्त प्रान्तों (यूनाईटेड प्रोविन्सेस) और अवध यानि कि वर्तमान उत्तर प्रदेश में लोधा जाति की जनसंख्या 10,46,816 थी और सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश क्षेत्र में लोधा के नाम से ही जानी जाति थी। इसकी पुष्टी के लिये ‘‘सेन्सस ऑफ इण्डिया -1921 इन यूनाईटेड प्रोसिन्सेस एण्ड अवध’’ (Census of India-1921 in United Provinces and Oudh) पुस्तक को पढ़ सकते हैं। पुस्तक में संयुक्त प्रान्त और अवध क्षेत्र में रहने वाली सभी जातियों की जनसंख्या के बारे में विस्तार से बताया गया है। पुस्तक के पृष्ठ 136 पर दी गई तालिका के क्रमांक 49 पर लोधा जाति की जनसंख्या बताई गई है जो कि सन् 1921 में हुई जनगणना के अनुसार 10,46,816 थी। तालिका में यह भी स्पष्ट किया है कि इस जनसंख्या में पुरूषों की संख्या 5,50,473 थी जबकि महिलाओं की संख्या 4,96,343 थी। लोधा जाति की कुल जनसंख्या में 7366 शिक्षित थे जिसमें 7091 पुरूष थे व 275 महिलाएं शिक्षित थीं। अंग्रेजी में शिक्षित लोधा लोगों की संख्या 153 थी जिसमें 123 पुरूष व 30 महिलाएं थीं। वास्तव में ये लोधा जाति के लिये गौरव की बात है कि सन् 1921 में भी लोधा जाति की महिलाएं अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण कर चुकीं थी जबकि महिलाओं का शिक्षित होना ही गर्व की बात है।

पृष्ठ 196 पर इस क्षेत्र में रहने वाले मान्सिक व शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों की जनसंख्या उनकी जातियों के साथ बताई गई है। जिसके लिये इस पृष्ठ पर एक तालिका दी गई है जिसमें क्रमांक 24 पर लोधा जाति का विवरण हैं। जिसके अनुसार लोधा जाति की कुल जनसंख्या में 130 मंदबुद्धि थे जिसमें 79 पुरूष व 51 महिलाओं की संख्या थी। 480 गुंगे बहरे थे जिसमें 299 पुरूष व 181 महिलाएं थी। अंधों की संख्या 2663 थी जिसमें 1182 पुरूष व 1481 महिलाएं थीं। पैरों से अपंग लोगों की संख्या 170 थी जिसमें पुरूष 139 व महिलाएं 31 थीं।

पृष्ठ संख्या 206 व 207 पर जो तालिका दी गई है उसके द्वारा यूनाइटेड प्रोविन्सेस, ब्रिटिश टेरेटरी और आगरा प्रोविन्स के सभी डिविजन व जिलों में रहने वाली जातियों की संख्या महिला व पुरूष की अलग-अलग बातई गई है। जिसमें लोधा जाति की जनसंख्या को इस लेख में निम्न तालिका के माध्यम से दिखाया जा रहा है।



इस सारणी में वर्तमान उत्तर प्रदेश के लगभग सभी जिले आ गये हैं। सन् 1921 में इन सभी जिलों में लोधा जाति के लोग उपरोक्तानुसार रहते थे और सिर्फ लोधा ही लिखते थे। यही कारण है कि जनगणना के समय जो रिकॉर्ड संधारित हुआ वह लोधा जाति के नाम से ही हुआ।

इसी पुस्तक के पृष्ठ 230 पर भी एक तालिका दी गई है जिसके क्रमांक 18 पर लोधा जाति का विवरण है। जिसमें बताया गया है कि लोधा जाति की जनसंख्या में कितने बच्चे थे, कितने किशोर थे, कितने युवा थे और कितने लोग अधेड़ उम्र के थे, कितने विवाहित थे कितने अविवाहित थे।

पृष्ठ 434 पर एक तालिका दी गई है जिसमें उद्योगों में काम करने वाले लोधा लोगों की संख्या बताई गई है। जिसके अनुसार चाय के उद्योग में 21, टेक्सटाईल मिलों में 203 लोग जिनमें 12 इन्जीनियर भी थे, ग्लास उद्योग में 1, कैमीकल उद्योग में 2, शुगर व राईस मिलों में 35 जिनमें 5 इन्जीनियर भी थे और प्रिन्टिग प्रेस में 79 लोग कार्यरत थे।

इसी प्रकार एच.एच. रिस्ले (H.H. Risley) द्वारा लिखित पस्तक ‘‘द ट्राइब्स एण्ड कास्ट आफ बंगाल वोल्यूम-2’’(The Tribe and Cast of Bengal Vol.II) जो कि सन् 1891 में प्रकाशित की गई थी। इस पुस्तक में उत्तर पश्चिमी प्रान्तों यानि कि वर्तमान उत्तर प्रदेश व बिहार में रहने वाले जातियों के कुछ लोगों का वर्णन किया है। पुस्तक के पृष्ठ संख्या 755 से 769 तक में लोधा जाति के 100 लोगों को सूचीबद्ध किया है जो कि आगरा, अलीगढ़, लखनऊ, बरेली, एटा, इटावा, मैनपुरी आदि जिलों से हैं।

विलियम क्रुक द्वारा लिखित सन् 1896 में प्रकशित पुस्तक ‘‘द ट्राईब्स एण्ड कास्ट्स ऑफ नोर्थ वेस्टर्न प्रोविन्सेस एण्ड अवध’’ वोल्यूम-3 (The Tribes and Casts of North Western and Oudh Vol.III) के बारे में बताना चाहता हूॅं। क्रुक महोदय ने अपनी इस पुस्तक में उत्तर पश्चिमी प्रान्तों व अवध के क्षेत्रों (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में रहने वाली तत्कालीन जातियों व जन जातियों के बारे में उनके नाम के आधार पर एल्फाबेटिकली विस्तार से बताया है। पुस्तक के पहले व दूसरे वोल्यूम में ए (A) से (J) अक्षर से प्रारम्भ होने वाली जातियों के बारे में बताया गया है। हमारी जाति का नाम चुंकि एल (L) से प्रारम्भ होता है, अतः इनकी तीसरी पुस्तक की पृष्ठ संख्या 364 से 370 तक में हमारी लोधा जाति के बारे में बताया गया है। सन् 1896 में प्रकाशित इस पुस्तक में लेखक ने लिखा है कि लोधा जाति कृषक व मजदूर वर्ग की जाति है जो कि उत्तर पश्चिमी व अवध के क्षेत्रों में बहुत तेजी से बढ़ रही है। इस पुस्तक में लोधा जाति की उतपत्ति के सम्बन्ध में लेखक ने कई सुझाव दिये हैं। जैसे कि लोधा शब्द संस्कृत के ‘लोधरा’ शब्द से बना है जिसका अर्थ है ‘एक पेड़ की छाल’ जो कि रंगाई के काम आती है। चुंकि ये लोग प्रारम्भ में पेड़ की छाल को इकट्ठा करके इसे बेच कर जीवन यापन करते थे इसलिये ये लोधा कहलाये। एक दूसरे सुझाव के अनुसार लोधा शब्द संस्कृत के ‘लुबधका’ शब्द से बना है जिसका अर्थ ‘एक निर्भीक‘ या ‘एक शिकारी’ होता है। बुलंदशहर डिस्ट्रिक के राजा लक्षमण सिंह के बुलन्द शहर डिस्ट्रिक मेमो के अनुसार लोधा जाति प्राचीन काल से ही इस डिस्ट्रिक में रहती थी। इस जाति का अस्तित्व पौराणिक काल से है। पुराण में कई जंगली जातियों का उल्लेख है जिन्हें सोध, रोध, लोध, बोध कहा जाता था। लोधा इन्हीं के वंशज हैं।

लेखक लिखते हैं कि आगरा के निचले इलाकों में कुछ परिवार रहते थे जो कि नाविक का कार्य करते थे। इनका जीवन स्तर काफी निम्न था। उच्च जाति के लोग इनके हॉंथ का छुआ पानी नहीं पीते थे। लेकिन आगरा के ऊपर के इलाकों में ऐसा नहीं था। आगरा के निचले इलाकों के ये परिवार लोधी लिखिते थे जो कि मध्य भारत के प्रान्तों की ओर तेजी से बढ़ रहे थे।

लेखक के अनुसार लोधा जाति कई उप जातियों में बंटी हुई थी। जैसे जरिया, पथरिया, मथुरिया, पुरबिया, कथारिया, माहोरिया, जैसवार, सिंगराउर, नरवरिया, अन्तरवेदी।

लोधा जाति की वैवाहिक परम्पराओं के बारे में लिखिते हुए लेखक महोदय बताते हैं कि ये अपने माता-पिता के गोत्र में शादियां नहीं करते हैं। इनमें विधवा विवाह कुछ प्रतिबंधो के साथ मान्य थे। तलाक भी दिया जा सकता था यदि समाज की पंचायत में यह साबित कर दिया जाये कि व्यभिचार हुआ है लेकिन पहले अपराध के लिये चेतावनी दे दी जाती थी। तलाकशुदा महिला समाज में दूसरा विवाह नहीं कर सकती थी। विवाह के समय दोनों परिवारों में उपहारों का आदान प्रदान होता था इसे दुल्हन की कीमत नहीं समझा जाता था। लेकिन यह माना जाता था कि दुल्हन के साथ दहेज आया है। विवाह के दिन दुल्हा चावल और उड़द की दाल से बनी लखारी अपनी ही जाति के लड़कों के साथ खाता था।

धर्म के सम्बन्ध में लिखा गया है कि ये लोग हिन्दू धर्म मानते थे। आगरा में ये देवी की पूजा करते थे साथ ही रामचन्द्र और कुआंवाला को मानते थे। ये लोग जखईया कुआंवाला मन्दिर में पूजा करते थे। इंटो के बने इस मंदिर में एक कुआं था इसके तीन दरवाजे थे। मंदिर के कुए में गेहूं की रोटी, पके हुए चावल, दूध, मिठाई और फूल आदि चढ़ाए जाते थे। महिलाएं पीतल के कटोरे के साथ नृत्य करतीं थी। ये पूजा असाढ़ माह में ही की जाती है। जखईया का ये मंदिर मैनपुरी डिस्ट्रिक के पनधारा गांव में स्थित है। आस-पास के कई जिलों से ये लोग यहां आते हैं। इस धार्मिक यात्रा की मान्यता है कि इससे बच्चे का जन्म आसानी से हो जाता है।

इसके अलावा आगरा के लोधा संन्त सईयद मोहसिन खान की भी पूजा करते थे। जिनका स्थान एतमादपुर में स्थित है। उन्नाव के लोधा ब्रहम्म देव की और अमरोहा व जलेसर के मियां की पूजा करते थे। इसमें कुआंर, अघेन और चैत के महीने की आखरी फसल में से पके हुए चावल और गेहूं की रोटी चढ़ाई जाती थी। लड़के के जन्म पर चढ़ावा बडे पैमाने पर किया जाता था।

इस पुस्तक में 1891 की जनगणना के आधार पर वर्तमान उत्तर प्रदेश में लोधा जाति की जनसंख्या 10,29,213 बताई गई है जिसे पुस्तक में तालिका बना कर जिलों व उपजातियों के आधार पर दर्शाया गया है। यह कि किस जिले में लोधा जाति की किस उप जाति के कितने लोग रहते हैं।

इस लेख में अभी तक बताई गई सभी ब्रिटिशकालीन पुस्तकों जो कि वर्तमान उत्तर प्रदेश से सम्बन्धित हैं, को पढ़ने से यह बात स्पष्ट हो जाती हैं कि ब्रिटिशकाल, मुगल काल या इससे पहले हमारी जाति सिर्फ और सिर्फ लोध या लोधा के नाम से ही जानी जाती थी यहां तक कि उत्तर प्रदेश में भी जहॉं वर्तमान में ज्यादातर लोधा जाति के लोग लोधी, लोधी राजपूत या राजपूत के नाम से जाने जाते हैं।

मध्यप्रान्तों (वर्तमान मध्यप्रदेश) में लोधा जाति

अब में बात करता हूॅं भारत के मध्यप्रान्तों की यानि कि वर्तमान मध्यप्रदेश की, जहां से हमारी जाति लोधा के साथ लोधी शब्द जुड़ा था, कब व कैसे जुड़ा यह आप लेख में आगे के विवरण से स्वयं जान सकते हैं। वैसे मैं जो ऐतिहासिक पुस्तकें आपकी जानकारी में लाना चाहता हूं, उन्हें पढ़ और समझ कर मैं यह तो कह सकता हूॅं कि भारत की जातियों में लोधी शब्द सम्भवतः उन्नीसवीं शताब्दी से ही प्रयोग में लिया गया है, वो भी सिर्फ मध्यप्रान्तों में। इसे स्पष्ट करने के लिये में कुछ ब्रिटिशकालीन ऐतिहासिक पुस्तकों में भारत की जातियों के सम्बन्ध में किये गये विवरण को आपके समक्ष रखना चाहता हूॅ।

सर्वप्रथम मैं सन् 1879 में प्रकाशित मैथ्यू एटमोर शैरिंग (Matthew Atmore Sherring) द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘हिन्दू ट्राईब्स एण्ड कास्ट्स वोल्यूम-2’’(Hindu Tribes and Castes Vol.-II) के विवरण से आपको परिचित कराना चाहता हूॅ। शैरिंग महोदय ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाली जातियों पर गहन अध्ययन कर कई पुस्तकें लिखीं जिसमें से ‘‘हिन्दु ट्राईब्स एण्ड कास्ट्स एज रिप्रजेन्टेड इन बनारस’’ पुस्तक का विवरण लेख में पहले ही किया जा चुका है जो कि उत्तर प्रश्चिमी क्षेत्रों यानि कि वर्तमान उत्तर प्रदेश में रहने वाली जातियों से सम्बन्धित थी। ‘‘हिन्दु ट्राईब्स एण्ड कास्ट्स वोल्यूम-3’’ नामक पुस्तक जो कि राजपुताना क्षेत्र यानि कि वर्तमान राजस्थान की जातियों से सम्बन्धित है का विवरण लेख में आगे किया गया है। शैरिंग महोदय की ‘‘हिन्दु ट्राईब्स एण्ड कास्ट्स वोल्यू-2’’ जिसका कि विवरण में प्रस्तुत करने जा रहा हूॅ यध्य प्रान्तों यानि कि वर्तमान मध्यप्रदेश में रहने वाली जातियों से सम्बन्धित है।

पुस्तक के कॉन्टेन्ट के पृष्ठ 13 पर कृषक जातियों का उल्लेख करते हुए शैरिंग महोदय ने लोधा व लोधी जाति को क्रमशः 12 व 13 क्रमांक पर रखा है अर्थात शैरिंग महोदय ने ये दो अलग-अलग जातियां मानी हैं। पृष्ठ 102,103 पर लोधा जाति का उल्लेख करते हुए क्रमांक 12 पर लिखा है कि लोधा जाति मध्यप्रान्तों के हौशंगाबाद जिले में रहती है जो कि लोधी से अलग है। क्रमांक 13 पर लिखा है कि लोधी मेहनती कृषक जाति है जो कि जबलपुर, सागर, नरसिंगपुर, भांदरा, छिन्दवाड़ा और दमोह में रहती है। ये लोग 300 वर्ष पहले बुंदेलखंड से दमोह में आये थे। दमोह जिले में इस जाति के लोग ज्यादातर भूस्वामी हैं महदेले वंश के हैं। ये बहुत उग्र और बदला लेने वाले हैं ये दमोह के 316 गावों पर अधिकार रखते हैं। ये मण्डला में 200 वर्षों से हैं, इनमें से कुछ लोग सागर और हौशंगाबाद में भी हैं। बानगंगा के लोधी शक्तीशाली थे, इनके कब्जे में 185 गांव थे। ये दो अलग-अलग शाखाओं में बंटे थे। पहले गंगा जमुना दोआब के थे जिनका सामाजिक स्तर रायपुर के लोधी लोगों से काफी ऊंचा था। ये इनके साथ ना तो खाना खाते थे ना ही वैवाहिक सम्बन्ध रखते थे। इनके पूर्वज दोआब से मण्डला के रास्ते बानगंगा आये थे। दूसरे थे रायपुर के लोधी जो संख्या में अधिक हैं किन्तु अन्य की तुलना में निम्न सामाजिक स्तर के हैं। दमोह के महदेले इनमें सर्वोच्च माने जाते हैं जो महालोधी लिखते हैं।

ब्रिटिश इतिहासकार आर.वी. रस्सेल ने भी भारत के मध्य प्रान्तों की जातियों पर अध्ययन कर 4 वोल्यूम्स में पुस्तकें लिखीं हैं। इन पुस्तकों में लोधा या लोधी जाति के बारे जो कुछ बताया गया है उसका सार वोल्यूम 4 में है। ‘‘द ट्राइब्स एण्ड कास्ट ऑफ द सेन्टरल प्रोविन्सेस ऑफ इण्डिया वोल्यूम-4’’ (The Tribes and Cast of the Central Provinces of India, Vol-IV) 1916 में प्रकाशित इस पुस्तक में पहली बार जातियों के विवरण में लोधा के साथ लोधी शब्द प्रयुक्त किया गया। पुस्तक में यह भी समझाने का प्रयास किया गया है कि लोधी शब्द कैसे व कहां से आया है। पुस्तक के लेखक आर.वी. रसेल (R.V. Russell) ने पुस्तक को लिखते समय श्री रायबहादुर हीरालाल से सहायता ली थी।

पुस्तक में मध्य प्रान्तों यानि कि वर्तमान मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ आदि क्षेत्रों में रहने वाली जातियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। पुस्तक के पृष्ठ 112 से 119 तक में लोधा, लोधी जाति का वर्णन करते हुए लिखते हैं किः

‘‘लोधा, लोधी जाति एक खेतिहर जाति है जो कि नर्बदा घाटी और विन्ध्य जिले में निवास करती है। वहां से ये बानगंगा घाटी और छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ तक फैल गए हैं। मध्य प्रान्तों में इनकी आबादी कुल 3 लाख है। लोधी यूनाईटेड प्रोविन्सेस से यहां आये थे। कई गजेटियरर्स में लिखा है कि असल में ये लोग पंजाब के लुधियाना से आये थे इसीलिये इन्हें लोधी कहा जाने लगा। इनका स्थाई नाम लोधा है परन्तु मध्यप्रान्तों में ये भ्रष्ट होकर होकर लोधी लिखने लगे। (लेखक ने इस सम्बन्ध में अंग्रेजी भाषा में जो लिखा है उसे में अंग्रेजी में ही लिख रहा हूॅ (Their proper designation is Lodha, but it has become corrupted to Lodhi in the Central Provinces.) काफी संख्या में ये लोग लोधा लिखते हैं जो कि होशंगाबाद की हरदा तहसील में रहते हैं और कहते हैं कि ये लोधी से अलग हैं। लेकिन इस बात को साबित करने के लिये इनके पास कोई तथ्य नहीं हैं। ये संभव है कि ये लोग पंद्रहवी शताब्दी में किसी अन्य जगह से हौशंगाबाद और बैतूल जिले में आये हों। ये लोग एक अलग भाषा बोलते हैं जो कि राजस्थान की तरह जानी जाती है, शायद इसिलिये इन्होंने अपनी जाति के नाम को भ्रष्ट नहीं किया। जबकि जबलपुर संभाग के लोधी सम्भवतः बाद में उत्तर भारत से आये हों। मण्डला में रहने वाले लोधी कहते हैं कि इन्हें ग्रहमण्डला के गोंड राजपुत राजा हृदयशाह द्वारा 17वीं शताब्दी में यहां लाया गया था और यहां उन्हें बहुतसारी वन भूमि प्रदान की गई थी। बाहर से आने वाली जातियों में लोधा जाति एक मिसाल थी जिन्होंने बाहर से आने के बाद अपने सामाजिक स्तर को ऊपर उठाया। मि. नेल्सफील्ड ने अपनी पुस्तक ‘‘ब्रीफ व्यू ऑफ द कास्ट सिस्टम ऑफ द नोर्थ वेस्टर्न प्रोविन्सेस एण्ड अवध’’ में लोधा जाति को कृषक वर्ग में निचले स्तर पर रखा था, जंगली जातियों के ऊपर के स्तर पर। नेसफील्ड के अनुसार लोधा शब्द क्लोड-ब्रीकर (Clod-Breaker) शब्द से लोड+हा (Lod+ha) से मिल कर बना है। उनका दूसरा सुझाव था कि लोधा शब्द लोध नामक पेड़ से लिया गया है। चुंकि उत्तर भारत के ये लोधा लोग इस पेड़ की छाल को बेचा करते थे जो कि रंगाई के काम आती थी। (इस पुस्तक का विवरण लेख में ऊपर दिया जा चुका है।)

हमीरपुर में लोधी का सम्बन्ध कुर्मी से जोड़ा जाता है। ‘सागर जिले में कहा जाता है कि पहले लोधी की उत्पत्ति महादेव के द्वारा एक कुर्मी महिला के खेत में स्थित बजूके से की गई थी और उसे खेत की सुरक्षा का काम दिया था। लेकिन लोधी अपने आप को राजपूत वंश का बताते हैं और कहते हैं कि वे अयोध्या के राजा रामचन्द्र के बड़े बेटे लव के वंशज हैं।

मध्यप्रान्तों में ये अपनी स्वयं की भूमि के मालिक बन गये थे और उच्च कृषक वर्ग की जातियों की तरह अपने को ठाकुर कहने लगे थे। दमोह और सागर में कई लोधी भूस्वामी थे जो मुसलमानों के अधीन अर्धनिर्भर स्थिति में थे। इन्होंने पन्ना के राजा को अपना अधिपति मान लिया था जिसने कुछ परिवारों को राजा और दीवान की उपाधियां प्रदान की थीं। ये एक निश्चित मात्रा में छोटे-छोटे राज्य और सैनिक दल भी रखते थे।

‘‘सेन्सस ऑफ इण्डिया 1891 जिल्द-11 सेनट्रल प्रोविन्सेस’’ (Census of India 1891 Vol.XI Central Provinces) नामक पुस्तक में जो कि 1893 में प्रकाशित की गई थी। यह पुस्तक 1891 की जनगणना के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार कर लिखी गई है। पुस्तक के पृष्ठ संख्या 129 पर एक तालिका दी गई है जिसमें कि मध्यप्रान्तों में रहने वाली जातियों के लोगों की साक्षरता की स्थिति बताई गई है। तालिका के अनुसार लोधा या लोधी जाति के 1,31,519 पुरूषों में से 3,366 पुरूष साक्षर थे जिनमें से 14 लोग अंग्रेजी शिक्षा में भी साक्षर थे। पृष्ठ 173,174 पर लोधा, लोधी के बारे में लिखा गया है कि

‘‘हौशंगाबाद जिले में 5353 लोधा लोग रहते हैं जो कहते हैं कि वे लोधियों से अलग हैं। लोधी लोग मुख्यतः चार जिलों में रहते हैं, सागर, दमोह, जबलपुर व नरिंसंगपुर। इसके अलावा सलपुरा की ओर भी इनकी बड़ी-बड़ी कॉलोनियां हैं जो कि भण्डारा, बालाघाट, नन्दगांव, खैरागढ़ व छुईखादन में है। उत्तर भारत के क्षेत्रों से आकर ये लोग मध्यप्रान्तों के उत्तरी जिलों में रहने लगे और कृषकों व भूस्वामियों के रूप में अच्छी स्थिति में आ गये। दमोह जिले में ये प्रमुख तालुकेदार व भूस्वामी हैं जो इनकी उपजातियों में सर्वोच्च, महालोधी उपजाति के हैं और वे नर्बदा घाटी के लोधियों से अपने को बेहतर मानते हैं। ये कृषकों में कुर्मी जाति के समकक्ष हैं बल्कि उनसे बेहतर दिख रहे है और कृषकों में ध्यान देने योग्य हैं। हालांकि स्वाभाव में ये कुर्मियों के विपरीत हैं, ये गर्म खून वाले, बदला लेने वाले और कहीं भी किसी गड़बड़ी में शामिल होने को तैयार रहते हैं।

इनकी प्रमुख उपजाति महालोधी है जो नरसिंहपुर और सागर में रहते हैं। छपरहास और सिंगरोर जबलपुर में, जरिया सागर में और महदेले दमोह में हैं। ये लोग नागपुर व छत्तीसगढ़ के बॉर्डर क्षेत्रों में भी काफी हैं जो कि जंघरा उप जाति से सम्बन्धित हैं। ये लोग छिंदवाड़ा जिले में भी रहते हैं। भंण्डारे जिले में इन्हें काफी शक्तिशाली व अच्छे रूप में बताया गया है।’’

इस पेज पर दी गई तालिका के अनुसार 1891 की जनगणना में मध्यप्रान्तों में लोधा या लोधी जाति की कुल जनसंख्या 2,87,241 बताई गई है साथ ही इस क्षेत्र में इनकी कितनी उपजातियां कितनी संख्या मैं है बताया गया है। जिसमें बसयान उपजाति के 4017, भदौरिया 6210, चांदपुरिया 1683, छपरहा 15875, दोंदासिया 3707, गुडलेया 1894, हरदिया 2342, जांगरा 65945, जंघेले 11894, जरिया 36123, किरबनिया 4113, लोहबंसी 1728, महालोधी 54691, महदेले 17149, नरवरिया 3718, रावत 1621 और सिंगरोरे उपजाति के 20897 लोग बताये हैं।

तालिका में कुल जनसंख्या को जिलेवार भी दर्शाया गया है। जिसके अनुसार सागर जिले में 47197, दमोह में 39211, जबलपुर में 47560, नरसिंहपुर में 32947, हौशंगाबाद में 7704, मण्डला में 5008, सेवनी में 5067, छिंदवाड़ा में 9451, नागपुर में 8509, भंण्डारा में 20903, बालाघाट में 18607, रायपुर में 8259, बिलासपुर में 8869, नन्दगांव में 3948, खैरागढ़ में 16612, छुइखन्दन में 3952 और कवरधा में 1677 लोग बताये गये हैं।

पृष्ठ 189,190 पर दी गई तालिका के अनुसार छोटा नागपुर में 3119 लोधा लोग रहते बताये गये हैं।

‘‘मध्यप्रदेश डिस्ट्रिक गजेटियरक नरसिंगपुर’’ (Madhyprdesh District Gazetteers Narsinghpur) पी.एन. श्रीवास्तव द्वारा लिखित, 1971 में प्रकाशित हुई इस पुस्तक के पृष्ठ 86 से 88 तक में लोधी जाति का विवरण है। पृष्ठ 86 पर एक तालिका दी गई है जिसमें 1931 की जनगणना के आधार पर नरसिंगपुर में रहने वाली जातियां उनकी जनसंख्या के साथ बताई गई है। जिसमें लोधी जाति की जनसंख्या 29265 बताई गई है। पृष्ठ 87,88 पर लोधी जाति का विवरण करते हुए लिखा गया है कि 1931 की जनगणना के अनुसार नरसिंहपुर में कुल जनसंख्या के 12 प्रतिशत लोधी हैं जो कि संख्या के आधार पर गोंड के बाद दूसरे नम्बर पर हैं। लोधी यहां भूस्वामी हैं और बहुत अच्छे कृषक हैं। इसी कारण से इन्हें यहां ‘‘पटेल’’ का दर्जा दिया गया है।

लोधी लोग यूनाईटेड प्रोविन्सेस से यहां आये थे। कहा गया है कि ये वास्तव में लुधियाना जिले से सम्बन्ध रखते हैं और ये नाम इन्होंने यहीं से लिया है। इनका वास्तविक नाम लोधा है परन्तु मध्य प्रान्तों में भ्रष्ट होकर (नाम बदलकर) लोधी लिखने लगे हैं।

इनकी कई उपजातियां हैं जैसे - महदेले, नरवरिया, भदौरिया हैं जो मुख्यतः नरसिंहपुर में हैं। इनके कुछ अन्तरवैवाहिक समूह जो यहां पाये जाते हैं वे महालोधी, जरिया, खाकरहा, जैसारी, ओनतो, सिंगरोरे और लोधा हैं। महदेले इनमें सर्वोच्च वंश है। इनके सामाजिक रीतिरिवाज व परम्पराएं इन्हें अन्य हिन्दू जातियों से भिन्न दर्शाते हैं। लोधी जाति विधवा विवाह को स्वीकार करती है। इसके लिये इन्होंने ‘‘कारी’’ व्यवस्था बना रखी है। इनका सामाजिक स्तर काफी ऊंचा है क्योंकि ये भूस्वामी व शासक भी हैं।

मध्यप्रान्तों यानि कि वर्तमान मध्यप्रदेश की जातियों से सम्बन्धित इन किताबों के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारी जाति पूरे भारत में लोधा के नाम से ही जानी जाती थी किन्तु मध्य प्रदेश में इसे बदल कर लोधी कर दिया गया था। जाति का नाम लोधा से लोधी कैसे और क्यों किया गया? इस सम्बन्ध में इन पुस्तकों के लेखकों ने यही सम्भावना व्यक्त की है कि, ये लोग पंजाब के लुधियाना से आये थे इसीलिये लोधी लिखने लगे थे। अगर इस बात को ही सही मान लिया जाये तो भी यह कहना गलत नहीं होगा कि इनके पूर्वज भी लोधा ही लिखते थे, क्योंकि सन् 1875 में प्रकाशित पुस्तक ‘‘स्टेटिकल डिस्क्रिप्टिव एण्ड हिस्टोरिकल एकाउन्ट ऑफ नोर्थ वेर्स्टन प्रोविन्सेस ऑफ इण्डिया वोल्यूम 2’’ जिसका विवरण लेख में ऊपर दिया गया है के पृष्ठ 187 पर लिखा है कि मेरठ डिवीजन के सहारनपुर में जब नहरों का काम चला तो हरियाणा और पंजाब से लोधा यहां काम करने आये और यहीं बस गये इसके अलावा कई इतिहासकारों ने यह भी लिखा है कि लुधियाना नगर लोधाओं द्वारा बसाया गया था। कुछ इतिहासकारों ने यह भी लिखा है कि ये उत्तर पश्चिमी प्रान्तों से यानि की उत्तर प्रदेश से यहां आकर बसे थे तो भी यह स्पष्ट है कि इनके पूर्वज लोधा ही लिखते थे।

इन ऐतिहासिक पुस्तकों का अध्ययन करने के पश्चात् मैं इस नतीजे पर पहुंचा हुं कि लुधियाना या उत्तर प्रदेश से मध्य प्रान्तों में आने वाले लोधा जाति के लोग यहां के राजाओं से जमीनें प्राप्त करके भूस्वामी बन गये थे और मेहनत करके इन्होंने अपने आर्थिक व सामाजिक स्तर को ऊपर उठाया। चुंकि यहां के स्थानीय लोधा लोगों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति निम्न थी। अतः इन स्थानीय लोधा लोगों के बीच अपनी अलग पहचान बनाने के उद्देश्य से इन्होंने अपनी जाति का नाम लोधा से बदल कर लोधी कर लिया होगा। जहां बात जाति के नाम की आती है तो यह सभी इतिहासकारों ने स्वीकार किया है कि मध्यप्रान्तों में रहने वाली लोधी जाति का वास्तविक नाम लोधा ही है।

इस बात की पुष्टी के लिये में ‘‘स्टेटिकल एबस्ट्रेक रिलेटिंग टू ब्रिटिश इण्डिया’’ (Statistical Abstract Relating to British India) नामक पुस्तक जो कि 1907 में प्रकाशित हुई, में दी गई जानकारी को सामने लाना चाहता हूॅं। इस पुस्तक के पृष्ठ संख्या 14 पर एक तालिका दी गई है जिसके अनुसार मध्य प्रान्तों, बेरार, संयुक्त प्रान्तों, मध्य भारत और राजपुताने के क्षेत्रों में 1901 की जनगणना के आधार पर लोधा जाति की जनसंख्या 16,63,354 बताई गई है। इस जनसंख्या में मध्यप्रान्तों व मध्यभारत के लोधी लिखने वाले लोग भी शामिल हैं। जिन्हें इस पुस्तक में लोधा ही कहा गया है।

पश्चिम बंगाल व उड़ीसा में लोधा जाति

अब हम बात करते हैं पश्चिम बंगाल व उड़ीसा की, यहां भी लोधा जाति प्राचीन काल से अस्तिव में है। पश्चिम बंगाल व उड़ीसा राज्यों में लोधा जाति को अनुसूचित जनजाति में रखा गया है।

‘‘सेन्सस ऑफ इण्डिया बंगाल-1901 वोल्यूम 6’’**(Census of India Bengal-1901 Vol.VI) की रिपोर्ट जो कि ई.ए. गैट (E.A. Gait) द्वारा सन् 1902 में प्रकाशित की गई थी के पृष्ठ 422 पर लोध, लोधा जाति के बारे में विस्तार से बताया गया है। जिसके अनुसार ‘‘लोध, लोधा, नोध जाति एन्गुल व उड़ीसा के सहायक राज्यों की आदिवासी जनजाति है। जिसका हैडक्वार्टर मध्यप्रान्तों में हैं जहां इनकी संख्या लगभग 3 लाख है। ये लोग मिदनापुर में पाये जाते हैं। कहा जाता है कि ये लोध सिंहभूम व मयूरभंज से आये हैं और इनका सम्बन्ध मयूरभंज के नोध लोगों से है। जो कि यहां की प्राचीन जातियों में से एक है। मिदनापुर में सहर व साबर जनजाति को इसका पर्याय कहा जाता है। इस जनजाति की उतपत्ती के बारे में मिदनापुर में कहा जाता है कि इन्हें पांच पाण्डवों ने जानवरों के शिकार के लिये चुना था। जबकि मयुरभंज में ये बलि राजा के वशंज कहे जाते हैं। इनका पारम्परिक व्यवसाय जंगली उत्पादों को इकट्ठा करना है। जैसे - कोकून, लाख, रार, शहद, मौम आदि। सहायक राज्यों में ये अभी भी इसी प्रकार जीवन यापन करते हैं और वहां इन्हें लोधा खेड़िया कहा जाता है। मिदनापुर में ये लोग सामान्यतः खेती करते हैं, मजदूरी करते हैं और जलाने वाली लगड़ी एकत्र करते हैं। ये उच्च पद के बाहरी लोगों को स्वीकार करते हैं। बाल विवाह भी करते हैं। मिदनापुर में ये बहुविवाह और विधवा विवाह की अनुमति देते हैं। परन्तु सहायक राज्यों में बहुविवाह वर्जित है जबकि विधवा विवाह की अनुमति है और मृत पति के भाई द्वारा दूसरे विवाह के लिये उसकी पसंद में कोई बाधा नहीं पहुंचाई जाति है। यदि विवाह अन्य जाति की महिला से हुआ हो तो तलाक भी मान्य है। मिदनापुर की एक रिपोर्ट के अनुसार शादियां माता-पिता द्वारा व्यवस्थित कराई जाति हैं और विवाह की विधि इनके ही जाति के व्यक्ति द्वारा सम्पन्न कराई जाति है जिसे ‘कोटल’ कहा जाता है। कोटल वर व वधु के हांथ पर कुशा घास बांधता है और फेरों की विधि के लिये ये दोनों को एक दूसरे के सम्मुख, वेदी के पास बिठाता है। ये वेदी एक पेड़ के नीचे की मिट्टी लेकर दोनों परिवारों की महिलाएं एक दिन पहले बनाती हैं। इस पर दो पानी के बर्तन होते हैं जिनमें आम की टहनी गढ़ी हुई होती हैं। यहां दूल्हा, दुल्हन की कलाई में लोहे की जूड़ियां पहनाता है और मांग में सिंदूर भरता है और विधि सम्पन्न होती है। सीतला लोधा लोगों के देवता हैं। मिदनापुर में ये वरूण और भैरव की पूजा करते हैं। ये अपने मृतकों को जलाते हैं और 10 दिन शोक रखते हैं, 11वें दिन ये बाल कटवाते हैं और वस्त्रों को धोते हैं एवं ब्राहम्मण को भोजन व धन देते हैं। संयुक्त प्रान्तों में भी लोधा जाति है। सम्भवतः इसी समुदाय से कुछ लोग बिहार व बंगाल में मिदनापुर के बाहर रह रहे हैं।

‘‘स्टेटिकल एकाउन्ट ऑफ द डिस्ट्रिक्ट मिदनापुर वोल्यूम-3 पार्ट-1’’ (Statical Account of the District Midnapur Vol-III Part-I) डब्ल्यू.डब्ल्यू. हन्टर (W.W. Hunter) द्वारा लिखित सन् 1876 में प्रकाशित इस पुस्तक के पृष्ठ 36 पर दीगई तालिका व पृष्ठ 41 पर दिये गये विवरण के अनुसार जिले में 68 निम्न स्तर की जातियां हैं जिनमें लोधा जाति को भी बताया गया है। लोधा लोगों की संख्या मजदुरों में 3574 बताई गई है।

‘‘सेन्सस ऑफ 24 परगना-1961’’(Census of 24 Pargunah-1961) की रिपोर्ट के पृष्ठ 104 पर जलपाईगुडी में अनुसूचित जनजाति वर्ग में लोधा व खेरिया लोगों की जनसंख्या संयुक्त रूप से 24009 बताई गई है। पृष्ठ 106 पर जलपाईगुडी में लोधा व खेरिया लोगों की पुरूष जनसंख्या 12119 और महिला जनसंख्या 11893 बताई गई है।

‘‘द एबोरिजनल ट्राईब्स ऑफ इन्डिया’’ (The Aboriginal Tribes of India) स्टेफन फच्स (Stephe Fuchs) द्वारा लिखित 1977 में प्रकाशित पुस्तक के पृष्ठ 109 व 110 के अनुसार वेस्ट बंगाल और बिहार में लोधा लोगों की जनसंख्या 43268 है। ये लोग बंगाली, उड़िया व मुन्दारी तीनों भाषाओं की मिश्रित भाषा बोलते हैं। जो मिदनापुर के जंगलों में भोजन इकट्ठा करने के लिये घुमन्तू जीवन जीते हैं। मैदानी इलाकों में ये मजदूरी करने का काम करते हैं। ये लोग वैवाहिक कबीलों में रहते हैं और अपने कुलदेवता से डरते हैं इसलिये समाज के नियमों को नहीं तोड़ते हैं। लोधा लोगों की पहचान यहां एक अपराधी जाति के रूप में है। इनकी आर्थिक आवश्यकता इन्हें इस राज्य में ले आई। मुख्यतः ये भोजन संग्रहण करने वाली जातियों में जाने जाते हैं। यद्यपि इनमें से कुछ ने हाल ही में कृषि को भी अपना लिया है।

सन् 1976 में अनुसूचित जाति व जनजातियों के सम्बन्ध में जारी राजपत्र के अनुसार उड़ीसा व पश्चिम बंगाल राज्य में लोधा जाति को अनुसूचित जनजाति में रखा गया है। राजपत्र के अनुसार उड़ीसा राज्य की कुल 62 अनुसूचित जनजातियों में लोधा जाति को क्रम संख्या 43 पर व 60 पर साबर जनजाति के साथ दशार्या गया है। इसी प्रकार पश्चिम बंगाल में कुल 38 जनजातियों में से लोधा जाति को क्रम संख्या 23 पर खेरिया व खारिया जनजाति के साथ दर्शाया गया है।

भारत की जनगणना 2001 के अनुसार पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जन जाति की कुल जनसंख्या 44,06,794 है। जो कि राज्य की कुल जनसंख्या का 5.5 प्रतिशत है। पश्चिम बंगाल में कुल 38 जातियों को अनुसूचित जनजातियों में शामिल किया गया है जिसमें 7वें नम्बर पर लोधा जाति को लिया गया है जिनकी कुल जनसंख्या 84966 बताई गई है, जोकि कुल अनुसूचित जनजातियों का 1.9 प्रतिशत है। इनमें से 95 प्रतिशत लोग ग्रामीण इलाकों में रहते हैं और इन 95 प्रतिशत में से आधे तो सिर्फ मिदनापुर, जलपाईगुड़ी, पुरूलिया और बर्धमान जिलों में ही हैं। लोधा जाति की साक्षरता दर 34.8 बताई गई है।

‘‘इण्डियाः ट्राईब वर्ल्ड’’ (India: Tribeal World) पुस्तक जो कि ऋषिकेश मण्डल, सुमित मुखर्जी व अर्चना दत्ता द्वारा लिखित व 2002 में प्रकाशित हैं। इस पुस्तक के पृष्ठ 30 व 31 के अनुसार लोधा जाति एक कृषक जाति है। सन् 1981 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में लोधा जाति को अनुसूचित जन जाति में रखा गया है। लोधा, खेरिया और खारिया जनजाति की संयुक्त जनसंख्या 53718 बताई गई है। पश्चिम बंगाल में लोधा लोग मुख्यतः मिदनापुर जिले में रहते हैं। उड़ीसा में ये मयूरभंज व बालेश्वर जिले में रहते हैं।

श्री सान्तनू पाण्डा व श्री अभिजीत गुहा ने केन्द्र सरकार द्वारा अनुसूचित जातियों के विकास के लिये बनाई गई योजनाओं का पश्चिम बंगाल की लोधा जाति पर प्रभाव का अध्ययन व सर्वेक्षण कर एक लेख ‘‘लोधा ऑफ वेस्ट बंगाल’’ तैयार किया है। जिसके अनुसार अनुसूचित जातियों के विकास व उत्थान के लिये केन्द्र सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ पश्चिम बंगाल में लोधा जाति को पूरी तरह से नहीं मिल पाया है। जिसका प्रमुख कारण लोधा लोगों की गरीबी बताया है। साथ ही सरकार द्वारा पट्टा वितरण योजना में इस जाति को ठीक प्रकार से पट्टे वितरित नहीं किया जाना भी पाया है।

लेख के अनुसार लोधा जाति के लोग पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में रहते हैं। भारत की स्वतंत्रता से पहले लोधा जाति को एक अपराधिक जाति माना जाता था जब तक कि क्रिमनल ट्राईब एक्ट 1952 लागू नहीं हुआ। स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना 1951 में लोधा जाति को पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जाति की सूची में रखा गया उस समय पश्चिम बंगाल में लोधा जाति की जनसंख्या 8346 दर्ज की गई थी जोकि पश्चिम बंगाल के बरधवान, बीरभूम, बनकुरा, मिदनापुर, हुगली, हावड़ा, कलकत्ता, मुर्शिदाबाद व जलपाईगुड़ी जिलों में रहते हैं।

1981 की जनगणना में लोधा जाति की जनसंख्या पश्चिम बंगाल में खेरिया व खारिया जाति के साथ 53718 बताई गई है। जिसमें से अकेले मिदनापुर जिले में लोधा जाति की जनसंख्या 16534 बताई गई है। लोधा जाति के लोग उड़ीसा के मयूरभंज व बालेश्वर जिले में भी बताये गये हैं।

पश्चिम बंगाल में लोधा जाति को वनवासी जाति बताया गया है। परन्तु अब यहां लोधा लोग खेती भी करने लगे हैं, शिकार व मछली पकड़ने का कार्य भी करते हैं। वर्तमान समय में लोधा लोग वन क्षेत्रों से बाहर फैल रहे हैं जहां ये खेती या अन्य क्षेत्रों में मजदूरी का कार्य करते हैं। परन्तु अब भी लोधा लोगों की आजीविका का मुख्य आधार जंगली उत्पादों को इकट्ठा करना ही है। ये लोग पत्तल दोने बनाकर बेचने के लिये पत्ते इकट्ठे करते हैं, लाख, शहद, कोकून, आदि इकट्ठा करतें हैं, सांप, छिपकली, मछली व कछुओं आदि को पकड़ कर बेचा करते हैं।

डॉ. पी.के. भौमिक ने अपने शोध ग्रंथ ‘‘लोधा इन वेस्ट बंगाल’’ में लोधा जाति के बारे में विस्तार से लिखा हैं। उनके अनुसार लुधियाना नगर लोधाओं द्वारा बसाया गया था तथा 11 वीं शदी तक यहां इनका राज्य था। मोहम्मद गौरी से हारने के पश्चात् ये लोग वेस्ट बंगाल, बिहार व मध्यप्रदेश आदि राज्यों में कबीलों के रूप में जाकर बस गये। इनका मूल स्थान लुधियाना नगर था।

राजपुताना (वर्तमान राजस्थान) में लोधा जाति

अब हम राजपुताना क्षेत्र में यानि कि वर्तमान राजस्थान में लोधा जाति के इतिहास की बात करेंगे। इसके लिये में सर्वप्रथम मैथ्यू एटमोर शैरिंग महोदय की पुस्तक ‘‘हिन्दू ट्राइब्स एण्ड कास्ट वोल्यूम-3’’**(Hindu Tribes And Castes Vol-III) जो कि सन् 1881 में प्रकाशित की गई थी। इस लेख में पूर्व में ही इनकी दो पुस्तकों का विवरण किया जा चुका है जो कि उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश की जातियों से सम्बन्धित थीं। इनकी तीसरी पुस्तक वोल्यूम 3 में राजपुताने की जातियों का वर्णन किया गया है। पुस्तक के पृष्ठ 55 पर खेतिहर जाति व जनजातियों में सबसे पहले लोधा जाति को रखा गया है और लिखा है कि ‘‘लोधा जाति के लोग पूर्वी राजपुताना जिलों में अधिक भूमि पर खेती करते हैं। धौलपुर में ये 45 गावों के मालिक हैं और 91 और गांवों की भूमि का भी उपयोग करते हैं। इस प्रकार लोधा लोग 17 हजार एकड़ भूमि को जोतते हैं।

कर्नल जेम्स टॉड (Colonel James Tod) द्वारा लिखित सन् 1920 में प्रकाशित पुस्तक ‘‘एनल्स एन्टीक्यूटीज ऑफ राजस्थान’’ (Annals Antiquities of Rajasthan Vol.II) और कर्नल जेम्स टॉड द्वारा लिखी हुई, श्री केशव ठाकुर द्वारा हिन्दी में अनुवादित सन् 2008 में प्रकाशित पुस्तक ‘‘राजस्थान का इतिहास भाग-2’’ का विवरण प्रस्तुत कर रहा हूॅ।

सन् 1920 में प्रकाशित पुस्तक में लोद्र राजपूतों से सम्बधित जानकारी पृष्ठ संख्या 1198 व 1199 पर दी है। इसी का हिन्दी अनुवाद की गई पुस्तक के पृष्ठ 16 पर लोद्र राजपूतों के सम्बन्ध में जानकारी दी गई है। जिसके अनुसार ‘‘देवरावल की दक्षिण सीमा पर लोद्र राजपूत रहते थे, उनकी राजधानी का नाम लुद्रवा था। यह 12 फाटकों वाला अत्यन्त विशाल नगर था। लुद्रवा के राजपुरोहित ने अपने राजा से अप्रसन्न होकर देवराज के यहां आश्रय लिया और उसने देवराज को लुद्रवा के प्रति उकसाया। उसकी बातों से प्रोत्साहित होकर देवराज ने लुद्रवा के राजा नृपभानु के पास उसकी पुत्री से विवाह करने का प्रस्ताव भेजा। राजा नृपभानु ने इसे ससम्मान स्वीकार कर लिया। परिणामस्वरूप देवराज 1200 साहसी अश्ववरोहियो की सैना लेकर विवाह के लिये लुद्रवा की राजधानी पहुंच गया। राजा नृपभानु ने उसका स्वागत किया किन्तु राजधानी में पहंचते ही देवराज के अश्वारोही सैनिकां ने आक्रमण कर दिया और लुद्रवा के राजा को परास्त कर वहां के राजसिंहासन पर बैठ गया और राजा नृपभानु की पुत्री से विवाह कर राज्य सैनिकों को सौंप कर वापस चला गया।

पुस्तक के इसी पृष्ठ पर लेखक ने लुद्रवा के सन्दर्भ में अपने विचार रखते हुए कहा है कि ‘‘यह नहीं कहा जा सकता कि लोदरा राजपुत किस कुल के हैं, सम्भवतः ये परमार या पुआर कुल के रहे होंगे। जिन्होंने एक समय में भारत के सम्पूर्ण रेगिस्तान को अपने अधिकार में किया हुआ था। भाटी लोगों ने जब तक की जैसलमेर की स्थापना नहीं हो गई लुद्रवा को ही अपनी राजधानी बनाए रखा था। लुद्रवा जो अतिप्राचीन व वैभवशाली नगर था अब खण्डर हो चुका है। जो अब कुछ चरवाहा परिवारों के कब्जे में है। मुझे लुद्रवा से तांबे की एक प्लेट मिली थी जो विजयराज के जमाने की थी।

इसके अतिरिक्त इतिहासकार जगदीश सिंह गहलोत की पुस्तक ‘‘राजपुताने का इतिहास-1’’ जो कि 1937 में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में लेखक ने राजस्थान के इतिहास का सुन्दर वर्णन किया है। पुस्तक के पृष्ठ 588 पर करौली राज्य की ऊंटगिरी तहसील का वर्णन करते हुए लेखक लिखते हैं कि, ‘‘तहसील ऊंटगिरी जो करौली राज्य के दक्षिण पश्चिम में है। इसके 6 तालुके हैं जिनमें 33 गांव हैं जो 16 खालसों व 17 जागीरों में बंटे हुए हैं। कुल आबादी 9048 वाली इस तहसील का क्षेत्रफल 309 वर्गमील यानिकी 1,79,760 एकड़ है। पहले यह प्रदेश लोधा लोगों के कब्जे में था जो मण्डरायल व ऊंटगिरी के हाकिमों को खिराज देते थे। राजा अर्जुनपाल ने सन् 1697 में इस इलाके पर अपना कब्जा किया और लोधा लोगों से मालगुजारी वसूल की। लोधों के बनवाये हुए बंध व तालाब यहां पर आज भी मौजूद हैं। अब इस तहसील में मीना व गुजर ही बसते हैं।

पृष्ठ 639 पर लिखा है कि, ‘‘लोद्रवा, जैसलमेर राजधानी से 10 मील दूर पश्चिम में है। इस समय यह उजाड़ पड़ा है परन्तु किसी समय यह 12 दरवाजों वाला विशाल नगर था। 10वीं शताब्दी में देवराज भाटी ने लोद्रा राजपूतों से छीनकर इसे अपनी राजधानी बनाया था जो जैसलमेर बसने तक रही। इसका अधिकांश भाग अब बालू रेत से दबा बड़ा है। यदि खुदाई की जाए तो दुर्लभ प्राचीन वस्तुएं यहां मिल सकती हैं। लोद्रा राजपूतों के बनें दो मन्दिर एक माता जी का और दूसरा पार्श्वनाथ जी का यहां पर आज भी मौजूद हैं। ये 700 से 800 वर्ष पुराने मालूम होते हैं।’’

सन् 1901 में की गई भारत की जनगणना के समय राजपुताना यानि कि वर्तमान राजस्थान प्रदेश में लोधा जाति की जनसंख्या के बारे में जानकारी हमें ‘‘सेन्सस ऑफ इण्डिया 1901 राजपुताना वोल्यूम 25’’ (Census of India Rajputana 1901 Voll.XXV) पुस्तक से प्राप्त हो सकती है। इस पुस्तक के पृष्ठ 165 पर दी गई तालिका के अनुसार 1901 की जनगणना के समय राजपुताने में लोधा जाति की जनसंख्या 44714 बताई गई है जिसमें 23395 पुरूष व 21319 महिलाएं हैं। पृष्ठ 172 पर दी गई तालिका में सन् 1901 व 1891 में की गई जनगणना का तुलनात्मक विवरण दिया गया है। जिसके अनुसार 1891 की जनगणना में लोधा जाति की जनसंख्या 45524 बताई गई है। इस प्रकार 1901 में राजपुताना क्षेत्र में लोधा जाति की जनसंख्या का कम होना बताया गया है। पृष्ठ 181 पर जो तालिका दी गई हैं उसमें राजपुताने के राजपूत वंशों का उल्लेख है। जिसमें तीन लोधा वंशों का होना बताया गया है।

‘‘सेन्सस ऑफ इण्डिया 1901 राजपुताना वोल्यूम 25ए’’ (Census of India Rajputana 1901 Voll.XXV-A) पुस्तक के पृष्ठ 252 दी गई तालिका के अनुसार राजपुताने में लोधा जाति की कुल जनसंख्या 44714 है। पृष्ठ 269 व 270 पर राजपुताने के वेस्टर्न डिवीजन में लोधा जाति की कुल जनंसख्या 228 बताई गई है जो कि मारवाड़ जिले में बताई गई है। पृष्ठ 293 से 295 पर दी गई तालिका में साउथर्न डिवीजन की जातियों की जनसंख्या बताई गई है जिसमें लोधा जाति की कुल जनसंख्या 851 बताई गई है। जिसमें से मेवाड़ जिले में 586, प्रतापगढ़ में 58 व सिरोही में 207 जनसंख्या बताई गई है। पृष्ठ 338 से 342 तक में दी गई तालिका में ईस्टर्न डिवीजन में लोधा जाति की जनसंख्या 43861 बताई गई है। जिसमें से जयपुर जिले में 1154, भरतपुर जिले में 6948, धौलपुर जिले में 10352, अलवर में 201, टोंक में 50, बूंदी में 341, कोटा में 24082, और शाहपुरा में 198 लोधा लोगों की जनसंख्या बताई गई है।

‘‘सेन्सस ऑफ इण्डिया 1931 राजपुताना एजेन्सी वोल्यूम 26’’ (Census of India Rajputana Agency 1931 Voll.XXVI) पुस्तक के पृष्ठ 124 पर राजपुताने क्षेत्र में लोधा लोगों की कुल जनसंख्या 48503 बताई गई है।

महाराष्ट्र में भी 1197 ई. से पूर्व हमारी लोधा जाति अस्तित्व में थी। यह बात हिन्दी के साहित्यकार श्री रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित ‘‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’’ नामक पुस्तक से प्रमाणित होती है। श्री शुक्ल ने अपने साहित्य में महाराष्ट्र में 1197 ई. में जन्में सन्त नामदेव के द्वारा रचित पद का उल्लेख पुस्तक के डिजिटल पृष्ठ 70 पर किया है। जो निम्न प्रकार है :

पाण्डे तुम्हारी गायत्री लोधे का खेत खाती थी।
लेकर ठेंगा टंगरी तारे लंगत-लंगत आती थी।।

इस पद से स्पष्ट होता है कि महाराष्ट्र में हमारा लोधा समाज 1197 ईं. से पूर्व अस्तित्व में था।

भारत की जातियों पर पंण्डित छोटेलाल श्रोत्रिय ने अपनी पुस्तक ‘‘जाति अन्वेषण’’ प्रथम भाग जो कि सन् 1914 में प्रकशित की गई के पृष्ठ 20,41,59 व 79 पर भारत की अन्य जातियों के साथ लोधा जाति का भी उल्लेख किया है, जिसमें लोधा जाति के 515 उप भेद या किस्में बताई हैं। पृष्ठ 287 व 288 पर लोधा जाति के बारे में लिखा है कि ये जाति भी मण्डल से अपने उद्धार की आशा लगाये हुए है। इस जाति के लोग कहीं लोधा व कहीं लोधी कहलाते हैं। पुर्वकाल में पापकर्मी हत्यारे समुदाय पर ये जाति रोष (क्रोध) करती थी। महाभारत में ऐसा लेख मिलता है कि ‘‘शुद्रासि रूद्रासि निरं´्जनोसी संसार माया परिवर्जनेति।।’’ अर्थात यह जाति क्रूर कर्मी जातियों से रूद्र यानि कि नाराज रहती थी इसलिये इन्हें रूद्र कहा गया जो बिगड़ कर रोध, लोध, लोधा, रोधी, लोधी हो गया। इस जाति का आदि स्थान नरवर है, यह क्षत्रीय वंश है। अनेकों स्थानों पर ये अब तक ‘‘ठाकुर साहब’’ कहलाते हैं। राजा लक्षमणदास ने यह लिख कर भूल की है कि आगरा के नीचे-नीचे के इलाकों में ये जाति इतनी नीची समझी जाती है कि इनके हांथ का छुआ पानी भी कोई नहीं पीता है। क्योंकि हमने गौढ़ व सनाढ़्य ब्राहम्मणों को इनके यहां पक्की रसोई जीमते व विवाह आदि सम्पूर्ण कर्म निधड़क कराते देखा है। शास्त्र व स्मृतियों में तथा अत्रिसहिंता से भी इस जाति की क्षत्रियत्वता सिद्ध होती है।

स्वतंत्र भारत में लोधा जाति

भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् लोधा जाति भारत के किन-किन प्रान्तों में कितनी संख्या में निवास करती थी और किस व्यवसाय से जुड़ी थी, इसकी जानकारी सन् 1951 में गठित पिछड़ी जाति आयोग की रिपोर्ट से मिलती है। ‘‘रिपोर्ट ऑफ बैकवर्ड कास्ट कमीशन’’ (Report of the Backword Caste Commission) जो कि 1955 में प्रकाशित की गई। इस रिपोर्ट में भारत की सभी जातियों का उल्लेख है जो कि पिछड़ी जाति की श्रेणी में हैं। रिपोर्ट के अनुसार पिछड़ी जातियों की सूची में लोधा जाति को अजमेर राज्य में 21वें नम्बर पर रखा गया है और इनकी जनसंख्या 1900 बताई है। भोपाल राज्य में 45वें नम्बर पर लोधा, लोधी के नाम से 33434 जनसंख्या बताई है जिसका मुख्य व्यवसाय कृषि बताया है। बिहार राज्य की जातियों में 81 नम्बर पर लोधा जाति को अतिपिछड़ी जाति में खानाबदोश माना है व 559 जनसंख्या बताई है। बोम्बे राज्य में 216 नम्बर पर लोधा जाति को दर्शाया गया है जो गाड़ीवान व पैसे उधार देनेवाले व्यवसाय से जुडे हुए बताये गये हैं। दिल्ली राज्य में पाईजाने वाली जातियों में 55 नम्बर पर लोधा,लोधी,लोध व महालोध के नाम से जाति दर्शाई गयी है यहां इनकी जनसंख्या 3477 बताई गई है और इन्हें बागवानी का कार्य करते बताया गया है। हैदराबाद राज्य में लोधा जाति को 86 नम्बर पर कृषी से जुड़ा हुआ बताया है और यहां इनकी जनसंख्या 14851 बताई गई है। मध्यभारत में 60 नम्बर पर लोधा, लोधी के नाम से जाति दर्शाई गई है जिसकी जनसंख्या 1,61,039 बताई है। मध्यप्रदेश में 70 नम्बर पर लोधा, लोधी जाति को, 3,80,448 जनसंख्या के साथ बताया गया है। राजस्थान राज्य में 71 नम्बर पर लोधा जाति को, 12086 जनसंख्या के साथ कृषकों के रूप में दर्शाया गया है। सौराष्ट में लोधा जाति को 50 नम्बर पर दर्शाया गया है। त्रिपुरा राज्य में 32 नम्बर पर लोधा जाति की 259 जनसंख्या बताई है जो चाय के बागानों में मजदूरी का कार्य करते बताये गये हैं। उत्तर प्रदेश राज्य में 86 नम्बर पर लोध के नाम से जाति को दर्शाया गया है और जनसंख्या 13,96,265 बताई गई है जो कृषी कार्य करते बताये गये हैं।

इसके अतिरिक्त इसी रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जाति की सूची में 35 नम्बर पर लोधा जाति को 68346 जनसंख्या के साथ दर्शाया गया है, जबकि अनुसूचित जनजाति में 9 नम्बर पर लोधा जाति को खेडिया जाति के साथ दर्शाया गया है। उड़ीसा राज्य में 15 नम्बर पर लोधा जाति को अनसूचित जनजाति में बताया गया है।

सन् 1955 में प्रकाशित पिछड़ी जाति आयोग की इस रिपोर्ट में भारत के जिन राज्यों में लोधा जाति का होना बताया है। उनमें लोधा शब्द से ही जाति को बताया गया है, केवल दिल्ली व वर्तमान मध्यप्रदेश के आसपास के क्षेत्र में लोधा के साथ लोधी शब्द का प्रयोग किया है। इस रिपोर्ट से भी यह साबित होता है कि 1951 से पहले मध्यप्रदेश को छोड़कर पूरे भारत में लोधा शब्द से ही जाति को जाना जाता था। यहां तक की उत्तर प्रदेश में भी लोध के नाम से ही इस जाती को जाना जाता था।

इसके बाद दुसरे बैकवर्ड कास्ट कमिशन का गठन किया गया जिसने सन् 1980 में अपनी रिपोर्ट पेश की थी। ‘‘रिपोर्ट ऑफ बैकवर्ड कास्ट कमीशन पार्ट 2, वोल्यूम 3 से 7-1980’’ (Report of the Backword Caste Commission Part-II, Vol.III-VII 1980) रिपोर्ट के पृष्ठ 170 से 227 तक में भारत के सभी राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में रहने वाली जातियां जो आयोग के अनुसार पिछड़ी जाति में बताई गई थीं उनका राज्यवार विवरण हैं। असम राज्य की जातियों में क्रम संख्या 83 पर, बिहार में क्रमांक 105, गुजरात में 48, मध्यप्रदेश में 182, राजस्थान में 88, त्रिपुरा में 90, उत्तर प्रदेश में 80, दिल्ली में क्रमांक 59 पर हमारी लोधा जाति को दर्शाया गया है।

सन् 1980 में प्रकाशित इस रिपोर्ट में भारत के ऊपर वर्णित राज्यों में लोधा जाति को पिछड़ी जाति में शामिल करने की सिफारिश आयोग द्वारा की गई थी। रिपोर्ट में वर्णित मध्यप्रदेश व दिल्ली राज्यों में लोधा शब्द के साथ लोधी शब्द भी लिखा गया है, जैसा कि 1955 में प्रकाशित रिपोर्ट में भी लिखा गया था, परन्तु इस रिपोर्ट में ध्यान देने वाली बात यह है कि राजस्थान राज्य में बताई गई जातियों में क्रमांक 88 पर केवल लोधी शब्द का ही प्रयोग किया गया है जबकि राजस्थान में इस जाति के रहने वाले लोगों में मुश्किल से 5 प्रतिशत लोग ही हैं जो लोधी लिखते हैं। इन तीन राज्यों के अतिरिक्त भारत के सभी राज्यों में हमारी जाति को लोधा शब्द से ही सम्बोधित किया गया है।

दूसरे पिछड़ी जाति आयोग की सिफारिश के अनुरूप राजस्थान में 29.08.1993 को पिछड़े वर्ग में कुछ जातियों को जोड़ कर संशोधित सूची जारी की गई जिसमें हमारी जाति को पिछड़ी जाति की सूची में स्थान मिला किन्तु सूची में जाति को लोधी शब्द से बताया गया। परिणामस्वरूप राजस्थान में हमारी जाति पिछड़ी जाति में शामिल होने के बावजूद समाज के लोगों को इसका फायदा नहीं मिला क्योंकि लगभग 95 प्रतिशत लोग जो कि लोधा लिखते थे उन्हें सरकार ने पिछड़ी जाति का नहीं माना। इस परिस्थिती की गम्भीरता को समझते हुए तत्कालीन प्रान्तीय लोधा महासभा के अध्यक्ष श्री गणेशराम लोधा व सलाहकार लोधा श्री श्यामलाल वर्मा निवासी खेड़ली पुरोहित, कोटा ने दिनांक 19.09.1993 को गोविन्दपुर बावड़ी, जिला बूंदी में लोधा समाज की प्रान्तीय बैठक आयोजित की जिसमें राजस्थान राज्य के विभिन्न जिलों से समाजबन्धु एकत्रित हुए और विचारविमर्श उपरान्त राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग को ज्ञापन के माध्यम से सूची में लोधा जाति को शामिल करने हेतु निवेदन करने का निर्णय लिया गया। फलस्वरूप प्रान्तीय लोधा महासभा के अध्यक्ष श्री गणेशराम लोधा व सलाहकार लोधा श्री श्यामलाल वर्मा द्वारा सदस्य सचिव, राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग, तत्कालीन अध्यक्ष राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग श्री इन्द्रसेन इसरानी जी व तत्कालीन मुख्यमंत्री महोदय राजस्थान राज्य को इस सम्बन्ध में कई बार पत्र प्रेषित किये गये। परिणाम स्वरूप राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के तत्कालीन सदस्य सचिव श्री सत्यनारायण सिंह द्वारा पत्र क्रमांक रा.रा.पि.व.आ./94/3860 जयपुर दिनांक 10.5.1994 व पत्र क्रमांक आर.एस.बी.सी.सी/94/4786 जयपुर दिनांक 5.7.1994 के द्वारा प्रान्तीय लोधा महासभा के अध्यक्ष श्री गणेशराम लोधा को सूचित किया गया कि राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा राजस्थान सरकार को लोधा जाति को पिछड़े वर्ग की सूची में जोड़ने की सिफारिश भेज दी गई है। इसके बाद भी महासभा द्वारा राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री महोदय को आयोग के संदर्भित पत्रों का हवाला देते हुए पिछड़े वर्ग की सूची में लोधा जाति को जोड़ने के लिये निवेदन किया गया। तब कहीं जाकर राजस्थान राज्य के पिछड़े वर्ग की सूची में क्रमांक 32 पर लोधी के साथ कोष्ठक में लोधा शब्द जोड़ा गया।

गौर तलब है कि प्रान्तीय लोधा महासभा द्वारा इस सम्बन्ध में पिछड़ा वर्ग आयोग को जो भी पत्र प्रेषित किये गये थे उनमें यह भी निवेदन किया गया था कि केन्द्र सरकार द्वारा जारी की गई पिछड़े वर्ग की सूची में जहां लोधा शब्द है वहां लोध व लोधी शब्द भी जोड़ा जाये, जिससे कि आरक्षण का लाभ सभी लोध, लोधा व लोधी लिखने वालों को मिल सके(साक्ष्य हेतु भेजे गये व आयोग से प्राप्त पत्रों की सोफ्ट कॉपी अखिल भारतीय लोधा महासभा की वैबसाईट के साक्ष्य सैक्शन में उपलब्ध है।)

श्प्रान्तीय लोधा महासभा के अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप 27 अक्टूबर 1999 को भारत सरकार ने पिछड़े वर्ग की सूची में संशोधन कर राजपत्र जारी किया जिसमें राजस्थान राज्य में लोधी के साथ लोधा व लोध तथा उत्तरप्रदेश में लोध, लोधा के साथ लोधी शब्द को जोड़ा गया। उपरोक्त सभी संदर्भित पुस्तकों, रिकॉर्ड्स, लेखों को आप इन्टरनेट पर पढ़ सकते हैं कठिनाई हो तो मुझसेे संपर्क कर सकते हैं मैं इनकी उपलब्धता सुनिश्चित करवा दूंगा मेरा मोबाइल नंबर लेख में ऊपर दिया गया है। वैसे मेरा यह प्रयास है कि येे सभी ऐतिहासिक साक्ष्य मैं शीघ्र ही वेबसाइट बनाकर एक ही स्थान पर उपलब्ध करा सकूं।

इन सब के अतिरिक्त लोधा जाति से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां मैं लेख में उल्लेखित कर रहा हॅूं जिनके प्रमाणित साक्ष्यों को जुटाने का मै प्रयास कर रहा हॅू और शीघ्र ही आपके समक्ष रखूंगा। ये जानकारियां निम्नप्रकार हैं।

राजस्थान के सवाईमाधोपुर की पूर्वी सीमा पर आधुनिक मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के श्योपुर क्षेत्र में गढ़खण्डहर का किला पार्वती नदी के तट पर आज भी विद्यमान है। यह किला लोधा शासकों द्वारा ही बनवाया गया था। क्षेत्रीय लोगों का कथन है कि इस किले से रात्री को एक आवाज आती है कि ‘है कोई लोधा हाजिर’। इस क्षेत्र में और भी कई किले है जो लोधा शासकों ने बनवाये थे।

मुगलकाल में सन् 1719 ई. में मुगल सम्राट ने फरूखाबाद के पास हुसैन गढ़ नामक स्थान पर हुसैन अली को सूबेदार नियुक्त किया था, लेकिन मुगल वंश के पतन के कारण हुसैन अली वहां का स्वतंत्र शासक बन गया था तथा स्थानीय जनता को परेशान करने लगा था। इसके अत्याचारों से तंग आकर छबीला राय नामक लोधा ने हुसैन अली के विरूद्ध जंग का ऐलान कर दिया था और इस जंग में छबीला राय की विजय हुई थी। जनता ने छबीला राय को हुसैन गढ़ का राजा बना दिया था।

मुगल काल की ही एक अन्य घटना के अनुसार उत्तर प्रदेश के काल्पी के राजा श्रीचंद लोधा थे। मुगल बादशाह मोहम्मद शाह ने राजा को मरवा कर उसे दरवाजे के नीचे गढ़वा दिया था।राजा श्रीचंद लोधा की 7 रानियां ने अपने सतित्व की रक्षा के लिये वहां के सूर्य मंदिर के प्रांगण में जौहर किया था। उन रानियां की याद में बनी 7 मठियां आज भी वहां मौजूद हैं। बड़ी रानी प्रभावती के नाम से सूर्यकुण्ड का नाम ‘‘प्रभावती लोधा सूर्यकुण्ड’’ हो गया है। यहां प्रतिवर्ष सूर्य यात्रा तालाब मेला भरता है तथा लोग प्रभावती लोधा कुण्ड में स्नान करते हैं। इतिहासकार इनायतुल्ला ने ‘‘ आयने कालपी’’ में श्रीचन्द लोधा के 7 रानियों के जौहर की पुष्टी की है।

ग्वालियर नरेश जीवाजी राव सिंधिया के द्वारा जारी आदेश जो 1946 में जारी किया गया था, इस आदेश में ग्वालियर नरेश ने लोध जाति का उल्लेख किया है, जो निम्न प्रकार है :

सर्वसम्बन्धित कार्यालयों को इस विज्ञप्ति द्वारा सूचित किया जाता है कि ‘‘श्रीमन्त सरकार ने अत्यन्त कृपावंत हो कर आज्ञा दिनांक 24 नवम्बर 1946 को प्रदान की है कि ‘ब्रिटिश भारत की भांति ‘लोध‘ कोम को भी ग्वालियर राज्य में सरकारी कागजात में ‘‘लोध राजपूत‘‘ लिखा जावे।’’

2 नवम्बर 1975 को हिन्दुस्तान टाईम्स में छपे लेख में लिखा है कि द्वापर युग में उत्तर भारत में यादव, अहीर, गुर्जर, गौरवा राजपूत, लोधा, जाट आदि जातियां गोपालन का काम करतीं थीं।


600 ई.पूर्व हमारे लोधा समाज के अस्तित्व में होने का उल्लेख श्री जगमोहन जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘बुद्धदेव’’ में किया गया है। इस पुस्तक में लिखा है कि कपिलवस्तु बसने से पूर्व अर्थात 600 ई. पूर्व यहां जंगलों को काट काट कर थारू एवं लोधा जाति ने छोटे-छोटे राज्य कायम किये थे।

इतिहासकार रमेश चन्द्र गुणार्थी ने अपनी ऐेतिहासिक पुस्तक ‘राजस्थानी जातियों की खोज’ के लोधा क्षत्रीय शीर्षक में लिखा हैं कि लोधा जाति यदुवंशियों की सह शाखा है। इस वंश के राजा भुवनपाल के द्वितीय पुत्र सामन्त पाल ने सर्वप्रथम करौली से जाकर पंजाब में लुधियाना नगर बसाया था।

सल्तनत काल की एक एतिहासिक घटना के अनुसार चित्तौड़ गढ़ के लोधा सरदार की लड़की का नाम विद्युलता था। विद्युलता अत्यंत सुन्दर एवं तीरन्दाजी, घुडसवारी व तलवारबाजी में माहिर थी। इस बाला का विवाह समर सिंह नामक युवक से होने वाला ही था कि तभी एका-एक सन् 1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी। मुस्लिम सैना से जब राजपूत सैना लड़ रही थी तब यह समर सिंह नाम युवक युद्ध छोड़ कर विद्युलता के पास आया और प्रस्ताव रखा कि हम तुम दोनों यहां से कहीं एकान्त वास में चलें, विद्युलता को यह बात सुन कर बहुत बुरा लगा और उसने समर सिंह को कहा कि जाओ पहले राज्य की रक्षा करो लेकिन समर सिंह ने दूसरा रास्ता अपनाते हुए अलाउद्दीन की सैना में जा मिला जिससे चित्तौड़ गढ़ की हार हुई। समर सिंह मुस्लिम सैना के सिपाहियों के साथ विद्युलता के पास पहुंचा तो विद्युलता समझ गई कि समर सिंह ने राज्य के साथ गद्दारी की है। उसने समर सिंह को फटकारते हुए कहा कि तू देश द्रोही है तुने मेरे इस शरीर के मोह वश ऐसा किया है मुझे धिक्कार है, मेरे कारण ही चित्तौड़ की हार हुई है। यह कर कर विद्युलता ने माता मही को प्रणाम कर अपनी ही कटार से अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।

आज से करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व आगरा और फिरोजाबाद क्षेत्र में लोधा जाति अस्तित्व में थी। इसका प्रमाण श्री वृन्दावन लाल चतुर्वेदी द्वारा लिखित रेखाचित्र ‘‘लल्लू कब लौटेगो’’ से भी मिलता है। इस रेखाचित्र में वृन्दावन लाल चतुर्वेदी लिखते हैं कि फिरोजाबाद में सोनपाल लोधा साग-सब्जी बेचा करता था। मेरी उससे अच्छी जान पहचान हो गई थी। एक दिन अंगौछा बिछा कर मुझे बिठा कर पूंछा कि मेरो ‘‘लल्लू कब लौटेगो’’ इसी कथन को मुख्य शीर्षक मानकर और सौनपाल लोधा से सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त कर रेखाचित्र की रचना की। यह रेखाचित्र कुछ वर्षों पूर्व राजस्थान की हिन्दी की पाठ्यपुस्तक में एक पाठ के रूप में पढ़ाया जाता था। इस रेखाचित्र के अनुसार सोनपाल लोधा के बेटे की ससुराल आगरा के पास भंमरौली कटारा में थी। इस लड़के को सरहदी बन्दी बना कर अंग्रेजों ने ट्रनीदाद टापू पर भेज दिया था। चतुर्वेदी जी ने सोनपाल लोधा के निवेदन पर उसके लड़के को भारत वापस बुलाने के लिये काफी प्रयास किये थे किन्तु उसे वापस नहीं बुला सके।

16 वीं और 17 वीं शताब्दी में मथुरा में लोधा जाति का अस्तित्व में होने का जीता जागता प्रमाण नाथद्वारा का मंदिर है। कहते हैं कि मुगल बादशाह औरंगजेब जब हिन्दु धर्म स्थलों की मूर्तियों तोड़ रहा था तब श्रीनाथ जी के मथुरा के मंदिर के पुजारी गोकुल भट्ट के नेतृत्व में लोधा लोगों के संयोग से श्रीनाथ जी की मूर्ती को मथुरा से ले जाकर उदयपुर के पास पहाडियों में छिपाया था। मुगल वंश के अन्त के बाद यहां श्रीनाथ जी के विशाल मंदिर का निर्माण करवाया गया जो आज भी नाथद्वारा में स्थित हैं। इस मंदिर में लोधा जाति के लोग आज भी सेवा करते हैं और प्राचीन काल से मंदिर के पास पीछे ही इनका निवास है, इस क्षेत्र को आज भी लोधा घाटी के नाम से जाना जाता है।

भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलाने की लड़ाई के इतिहास का अवलोकन करने से पता चलता है कि भारत की आजादी के लिये भी लोधा जाति के लोगों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। रामगढ़ की रानी अवन्तीबाई, हिन्डोरिया के राजा किशोर सिंह, लखनऊ के अमीनाबाद पार्क में निषेधाज्ञा के समय तिरंगा झंडा फहराने वाले गुलाब सिंह, दिल्ली के तेलीपाड़ा के मातादीन लोधा, हैदराबाद के अमरसिंह लोधा, आदि शहीदों के बारे में तो हमें थोड़ी बहुत जानकारी है, परन्तु इनके अतिरिक्त भी हमारी लोधा जाति के कई ऐसे वीर शहीद हैं जिन्होंने देश की आजादी के लिये अपने प्राणों की आहुतियां दी थीं जिनके विषय में शायद हमें कोई जानकारी नहीं हैं। इनमें से कुछ के बारे में मुझे जो थोड़ी सी जानकारी प्राप्त हुई है में आपके समक्ष रख रहा हूॅं।

शहीद बुहारे लोधा जो कि उत्तर पश्चिमी प्रान्त (वर्तमान उत्तरप्रदेश) के आगरा जिले के रहने वाले थे। ये ब्रिटिश इन्डियन आर्मी की एक कम्पनी में सिपाही थे। इन्होंने 1857 के स्वतंत्रता आन्दोलन के समय ब्रिटिश सरकार की नौकरी छोड़ कर क्रान्तिकारियों से हॉंथ मिला लिया और कई स्थानों पर अंग्रेज सरकार के विरूद्ध लड़ाईयां लड़ी जो कि 1858 में अंग्रेजो के द्वारा मार दिये गये।

शहीद कासी लोधा जो कि बाएरी, कानपुर वर्तमान उत्तरप्रदेश के रहने वाले थे। इन्होंने 1857 की क्रान्ति के दौरान क्रान्तिकारियों का साथ दिया था और कई अवसरों पर अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई लड़ी थी। अंग्रेजों ने इन्हें धोखे से पकड़ कर उन पर ब्रिटिश सम्पत्ती को लूटने और विद्रोह का आरोप लगा कर मौत की सजा सुना दी थी और 1861 में फॉसी पर लटका दिया था।

शहीद मनसुख लोधा जो कि वर्तमान उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के नाकू ग्राम में जन्में थे। इन्होंने 1857 की क्रान्ती में हिस्सा लिया था और अपने पड़ौसियों को भी अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध हथियार उठाने के लिये तैयार किया था। लेकिन विद्रोह को पूरी तरह से दबाने के बाद अंग्रेजों ने इन्हें मेरठ क्षेत्र से गिरफ्तार कर लिया और इन पर हत्या और सरकारी सम्पत्ती को लूटने का आरोप लगा कर इन्हें मौत की सजा सुना दी और 1858 में फॉसी पर लटका दिया था।

शहीद फीकम लोधा जिनका जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में हुआ था। ये ब्रिटिश इण्डियन आर्मी की एक कम्पनी में हवलदार थे। इन्होंने अंग्रेजों की नौकरी छोड़ कर 1857 के आन्दोलन में क्रान्तिकारियों का साथ दिया था और अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध लड़ाई लड़ी थी। मैनपुरी में जब अंग्रेजी सैना विद्रोह दबाने के लिये बढ़ रही थी तब इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और फांसी दे दी गई।

शहीद रूत्तन सिंह लोधा जो कि आगरा उत्तरप्रदेश के रहने वाले थे। ये ब्रिटिश शासन के अधीन आगरा सेन्ट्रल जेल में आकस्मिक गार्ड में दफादार थे। जब 1857 में स्वतंत्रता आन्दोलन शुरू हुआ तो इन्होंने ब्रिटिश सर्विस को छोड़ दिया और क्रान्तिकारियों से हांथ मिला लिया और ब्रिटिश शासन के विरूद्ध आन्दोलन में शामिल हो गये। ये क्रान्तिकारियों के साथ दिल्ली के लिये चल पढ़े और कई अवसरों पर इन्होंने ब्रिटिश सैना से लड़ाई की। 1858 में ये ब्रिटिश सैना से लड़ाई के दौरान मारे गये।

ऐसे शहीदों के बारे में और उन इतिहास पुस्तकों के बारे मैं जिन में लोधा जाति के संबंध में लिखा गया है और जानकारियां जुटाने का प्रयास कर रहा हूॅं, जिन्हें शीघ्र ही आपके समक्ष रखूंगा। मुझे विश्वास है कि लोधा जाति के ऐसे वीर बलिदानी और भी कई होंगे जिन्होंने इस देश की आजादी के लिये अपने प्राणों की आहुतियां दी हैं।

हम सब समाज बंधुओं को यह जान कर अपार हर्ष होगा कि अतीत की भांति वर्तमान में भी सम्पूर्ण भारत में हमारा लोधा समाज बसा हुआ है। राजस्थान में लोधा जाति के लोग झालावाड़, कोटा, बूंदी, बारां, भरतपुर, धौलपुर, गंगापुर, करौली, जयपुर, अजमेर, आबूरोड़, भीलवाड़ा, चित्तौड़, उदयपुर, राजसंमद आदि जिलों में हजारों की संख्या में निवास करते हैं। गुजरात के अहमदाबाद, राजकोट, सूरत, बडौदा और दीसा आदि में हमारे लोधा समाज की काफी जनसंख्या है। मध्यप्रदेश के सभी 45 जिलों में लोधा समाज बसा हुआ है यहां कुछ लोग लोधा तो कुछ लोग लोधी लिखते हैं। आंध्रप्रदेश के हैदराबाद शहर में करीब डेढ़ लाख लोधा निवास करते हैं, यहां ज्यादातर लोध शब्द का प्रयोग करते हैं। उड़ीसा के बालासौर, कालाहॉॅडी, मयूर भंज, आदि जिलों में लोधा समाज की काफी जनसंख्या है। उड़ीसा सरकार ने लोधा समाज के विकास के लिये ‘‘लोधा विकास एजेन्सी’’ नामक संस्था बना रखी है। वेस्ट बंगाल के मिदनापुर, हुगली, पुरलिया, आदि जिलों में हजारों की संख्या में लोधा समाज बन्धु निवास करते हैं। इसी प्रकार बिहार, झारखंण्ड, उत्राखण्ड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, हरियाणा और पंजाब में काफी संख्या में हमारा लोधा समाज निवास करता है। भारत के केन्द्र शासित प्रदेशों में भी लोधा समाज काफी संख्या में निवास करता है। त्रिपुरा, मेघालय, असम, नांगालैण्ड में काफी लोधा निवास करते हैं और हमारी लोधा जाति की सबसे अधिक जनसंख्या भारत के उत्तरप्रदेश प्रान्त में है, जहां हमारे समाज के अधिकांश लोग लोधी लिखते हैं। भारत के अतिरिक्त नेपाल देश में भी लोधा समाज निवास करता है।

लोधा जाति के इतिहास एवं जनसंख्या की दृष्टि से हमें हमारी लोधा जाति पर गर्व होना चाहिये और गर्व से लोधा कहना चाहिये और अपने बच्चों के नाम के साथ उपनाम के रूप में लोधा शब्द का प्रयोग अवश्य करना चाहिये ना कि अपने गोत्र आदि का। में उन समाज बन्धुओं से जो लोधी लिखते हैं, यह नहीं कहता कि वे लोधा लिखने लगें लेकिन यह अवश्य कहना चाहूंगा यह स्मरण रखें कि आदिकाल में हम सभी के पूर्वज लोध या लोधा के नाम से ही जाने जाते थे। इसलिये लोध या लोधा शब्द का सम्मान करें व लोध, लोधा या लोधी लिखने वालों में भेदभाव न करें। वर्तमान में हमारी जाति लोध, लोधा, लोधी तीनों ही नामों से जानी जाती है।